इस्लाम धर्म में रमजान माह की खास अहमियत है। कहा जाता है कि इसी माह में पवित्र किताब कुरान शरीफ आसमान से उतारी गई थी। रोजे इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। रोजा आपसी भाईचारे का प्रतीक है वहीं इंसान को अपनी इच्छाओं पर काबू करने का संदेश भी देता है। रोजा गरीबों व जरूरतमंदों के दुख दर्द व भूख प्यास का आभास कराता है।
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ramadan 2018
इस्लाम के जानकार और मोलाना याहया करीमी का कहना है कि रमजान का महीना सब्र व सुकून का है। इस दौरान अल्लाह की खास रहमतें बरसती हैं। अल्लाह ने कुरान शरीफ में कई जगह रोजा रखने को जरूरी बताया है।
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रोजे का इतिहास
अल्लाह के हुक्म से सन 2 हिजरी से मुसलमानों पर रोजे अनिवार्य किए गए। इसका महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि रमजान में शब-ए-कद्र के दौरान अल्लाह ने कुरान जैसी नेमत किताब दी। रमजान में जकात (दान) का खास महत्व है। किसी के पास अगर सालभर उसकी जरूरत से ज्यादा साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर की नकदी या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात यानी दान के रूप में गरीब या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाना चाहिए।
रोजे के मायने
रोजा को अरबी भाषा में सौम कहा जाता है। सौम का मतलब होता है रुकना, ठहरना यानी खुद पर नियंत्रण या काबू करना। यह वो महीना है, जब हम भूख को शिद्दत से महसूस करते हैं और सोचते हैं कि एक गरीब इंसान भूख लगने पर कैसा महसूस करता होगा। बीमार इंसान, जो दौलत होते हुए भी कुछ खा नहीं सकता, उसकी बेबसी को महसूस करते हैं।