जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि आस्था और समानता का प्रतीक है। जानें छप्पन भोग, अबाढ़ा महाप्रसाद, आनंद बाजार और इससे जुड़ी रोचक मान्यताओं के बारे में।
Jagannath Mandir Mahaprasad: ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर केवल अपनी भव्यता और धार्मिक महत्ता के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मंदिर से जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं हैं, जो सदियों से लोगों को आकर्षित करती रही हैं। इन्हीं में से एक है भगवान जगन्नाथ को अर्पित किया जाने वाला महाप्रसाद, जिसे श्रद्धालु बेहद पवित्र और दिव्य मानते हैं। प्रतिदिन हजारों भक्त इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं, लेकिन इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे केवल भोजन नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर में दिनभर अलग-अलग समय पर भगवान को कई बार भोग अर्पित किया जाता है, जिनमें छप्पन भोग का विशेष महत्व है। मंदिर की विशाल रसोई में तैयार होने वाले इस प्रसाद को 'अबाढ़ा महाप्रसाद' कहा जाता है। यह नाम अपने आप में एक गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश समेटे हुए है। आखिर इस प्रसाद को अबाढ़ा क्यों कहा जाता है, इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और कैसे यह समानता, भाईचारे और भक्ति का प्रतीक बन गया? आइए जानते हैं जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद से जुड़े इस रोचक रहस्य और उसकी अनोखी परंपरा के बारे में।
महाप्रभु के छप्पन भोग की अनूठी परंपरा
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बेहद खास माना जाता है। मंदिर की विशाल रसोई में तैयार होने वाले इन व्यंजनों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बांटा गया है-पके हुए भोजन और सूखे अथवा मिठाई वाले प्रसाद। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है।
विज्ञापन
3 of 10
इनमें मीठे चावल से लेकर खिचड़ी, सादा भात, दाल और सब्जियों के कई प्रकार शामिल हैं।
- फोटो : instagram
शंखुड़ी भोग: मिट्टी के बर्तनों में पकने वाला प्रसाद
शंखुड़ी भोग में वे सभी व्यंजन शामिल होते हैं जिन्हें मंदिर की रसोई में पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है। इनमें मीठे चावल से लेकर खिचड़ी, सादा भात, दाल और सब्जियों के कई प्रकार शामिल हैं।
कनिका नामक मीठा चावल घी, गुड़ और सूखे मेवों से तैयार किया जाता है, जबकि खिचड़ी चावल, दाल और शुद्ध घी से बनती है। ओडिशा का प्रसिद्ध व्यंजन डालमा भी छप्पन भोग का अहम हिस्सा है, जिसमें दाल और कई तरह की देशी सब्जियां डाली जाती हैं। इसके अलावा बेसर, महुरा और विभिन्न प्रकार के साग भी भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
4 of 10
मालपुआ के स्थानीय रूप सना और बड़ा अमूलू भी महाप्रभु के प्रिय भोगों में गिने जाते हैं।
- फोटो : Adobe stock
पीठा और पारंपरिक मिठाइयों का विशेष स्थान
छप्पन भोग में कई तरह के पीठा और पारंपरिक मिठाइयां भी शामिल होती हैं। पोड़ा पीठा, एंडुरी पीठा, आरिसा पीठा और काकरा पीठा जैसे व्यंजन ओडिशा की समृद्ध खाद्य संस्कृति की झलक दिखाते हैं। नारियल, गुड़, चावल के आटे और सूजी से तैयार ये व्यंजन स्वाद और परंपरा का अद्भुत संगम माने जाते हैं। मालपुआ के स्थानीय रूप सना और बड़ा अमूलू भी महाप्रभु के प्रिय भोगों में गिने जाते हैं।
विज्ञापन
5 of 10
सूखे प्रसाद की भी है अलग पहचान
- फोटो : इंस्टाग्राम
सूखे प्रसाद की भी है अलग पहचान
छप्पन भोग में कुछ ऐसे व्यंजन भी शामिल हैं जिन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। खाजा, गजा, मगाजा लड्डू और खुड़ुमा जैसे सूखे प्रसाद श्रद्धालुओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। इनमें खास तौर पर खाजा को जगन्नाथ महाप्रसाद की पहचान माना जाता है और देश-विदेश से आने वाले भक्त इसे अपने साथ लेकर जाते हैं।
विज्ञापन
6 of 10
भगवान को दिनभर अलग-अलग समय पर छह चरणों में भोग अर्पित किया जाता है।
- फोटो : ANI
दिन भर में छह बार लगता है भोग
जगन्नाथ मंदिर में भगवान को दिनभर अलग-अलग समय पर छह चरणों में भोग अर्पित किया जाता है। सुबह की शुरुआत हल्के नाश्ते से होती है, जिसमें फल और दुग्ध उत्पाद शामिल रहते हैं। इसके बाद क्रमशः सुबह का भोजन, भोग मंडप, मध्याह्न भोग, संध्या भोग और रात्रि विश्राम से पहले बड़ा सिंगार भोग अर्पित किया जाता है। हर भोग का अपना विशेष महत्व और निर्धारित मेन्यू होता है, जो मंदिर की परंपरा के अनुसार सदियों से चला आ रहा है।
विज्ञापन
7 of 10
‘अबाढ़ा’ शब्द का अर्थ है, ऐसा प्रसाद जिस पर किसी प्रकार का भेदभाव या प्रतिबंध लागू न हो।
- फोटो : ANI
आखिर महाप्रसाद को ‘अबाढ़ा’ क्यों कहा जाता है?
जगन्नाथ मंदिर की रसोई में तैयार भोजन को शुरुआत में सामान्य अन्न माना जाता है। लेकिन जब इसे भगवान जगन्नाथ को अर्पित करने के बाद माता विमला के समक्ष समर्पित किया जाता है, तब यह महाप्रसाद या ‘अबाढ़ा’ कहलाता है।
‘अबाढ़ा’ शब्द का अर्थ है, ऐसा प्रसाद जिस पर किसी प्रकार का भेदभाव या प्रतिबंध लागू न हो। यही वजह है कि इस महाप्रसाद को जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति से ऊपर माना जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार इसे कोई भी श्रद्धालु ग्रहण कर सकता है और यह कभी अशुद्ध नहीं माना जाता।
8 of 10
माना जाता है कि महाप्रसाद सभी को समान रूप से जोड़ता है।
- फोटो : पीटीआई
समानता और भाईचारे का प्रतीक है अबाढ़ा
जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता सामाजिक समरसता है। माना जाता है कि महाप्रसाद सभी को समान रूप से जोड़ता है। यहां राजा और आम व्यक्ति, अमीर और गरीब, सभी एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि अबाढ़ा को केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और आध्यात्मिक समानता का प्रतीक माना जाता है।
9 of 10
पौराणिक कथा से जुड़ा है अबाढ़ा का महत्व
- फोटो : Adobe Stock
पौराणिक कथा से जुड़ा है अबाढ़ा का महत्व
मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ पहले नीलमाधव स्वरूप में शबर समुदाय के राजा बिश्वावसु द्वारा पूजे जाते थे। उनकी पूजा में किसी प्रकार का भेदभाव या जटिल नियम नहीं था। बाद में जब पुरी में भव्य मंदिर की स्थापना हुई, तब भी भगवान की इच्छा के अनुसार भोजन और प्रसाद वितरण की वही सरल और सर्वसमावेशी परंपरा जारी रखी गई। इसी भावना के कारण इस महाप्रसाद को ‘अबाढ़ा’ नाम मिला।
माता विमला को अर्पित किए जाने के बाद ही यह भोजन महाप्रसाद का स्वरूप ग्रहण करता है।
मंदिर परिसर का ‘आनंद बाजार’ वह स्थान है जहां हजारों श्रद्धालु एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।
बचा हुआ सूखा प्रसाद ‘निर्माल्य’ कहलाता है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।