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पितृ पक्ष 2026: श्राद्ध पक्ष में इस सूक्त का करें पाठ, पितरों की कृपा मिलने की है मान्यता

Wed, 30 Sep 2026 09:57 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

पितृ पक्ष में पितरों के तर्पण और श्राद्ध के साथ धार्मिक ग्रंथों में बताए गए मंत्रों और सूक्तों के पाठ का भी विशेष महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं पितृ सूक्त के पाठ से जुड़ी धार्मिक मान्यता और इसका महत्व।
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पितृ सूक्त पाठ - फोटो : amar ujala

पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इन दिनों पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी क्रम में पितरों की शांति और सद्गति की कामना से विभिन्न मंत्रों और सूक्तों का पाठ भी किया जाता है। इनमें पितृ सूक्त का विशेष उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि इसका पाठ श्रद्धा और विधि के साथ करने से पितरों की कृपा प्राप्त होती है।

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पितृ पक्ष के दौरान इसके पाठ को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। - फोटो : adobe stock

क्या है पितृ सूक्त?
पितृ सूक्त वैदिक परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें पितरों का स्मरण और उनका आह्वान किया जाता है। इसमें पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके आशीर्वाद की कामना की जाती है। पितृ सूक्त के मंत्रों में पितरों को यज्ञ में आमंत्रित करने, उन्हें श्रद्धापूर्वक अर्पण स्वीकार करने और परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की गई है। इसलिए पितृ पक्ष के दौरान इसके पाठ को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

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पितृ सूक्त का पाठ भी इसी भावना से किया जाता है। - फोटो : adobe stock

पितृ सूक्त पाठ का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृ पक्ष में पितरों का स्मरण करने और उनके निमित्त पूजा-पाठ करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। पितृ सूक्त का पाठ भी इसी भावना से किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पितृ सूक्त का पाठ करने से पितरों की शांति की कामना पूरी होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। कुछ धार्मिक परंपराओं में इसे पितृ दोष से संबंधित शांति कर्मों के साथ भी जोड़ा जाता है। हालांकि, पितृ दोष और उसके प्रभावों से जुड़ी बातें धार्मिक ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।

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पितरों के निमित्त सात्विक भोजन और दान करने की परंपरा है। - फोटो : freepik

पितृ पक्ष में किन बातों का रखें ध्यान?

  • श्राद्ध और तर्पण अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें।
  • पितरों के निमित्त सात्विक भोजन और दान करने की परंपरा है।
  • पूजा-पाठ के दौरान स्वच्छता और शुद्धता का ध्यान रखें।
  • मंत्रों का पाठ सही उच्चारण के साथ करने का प्रयास करें।
  • किसी विशेष श्राद्ध कर्म या पितृ दोष निवारण के लिए योग्य आचार्य की सलाह ली जा सकती है।
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पितरों का आशीर्वाद परिवार के लिए मंगलकारी माना जाता है। - फोटो : AI
पितृ सूक्त में किसकी प्रार्थना की जाती है?
पितृ सूक्त के मंत्रों में दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनसे परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। इसमें पितरों के यज्ञ में आने, अर्पित हवि को स्वीकार करने और परिवार को आशीर्वाद देने का भाव मिलता है। पितृ पक्ष में इस सूक्त का पाठ मुख्य रूप से पूर्वजों के प्रति सम्मान, श्रद्धा और उनकी शांति की कामना के उद्देश्य से किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों का आशीर्वाद परिवार के लिए मंगलकारी माना जाता है।
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पितृ-सूक्तम् - फोटो : AI
।। पितृ-सूक्तम् ।। 
 
उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
 असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥1॥
 
अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥2॥
 
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥3॥
 
त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।
तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥4॥
 
त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।
वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥5॥
 
त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।
तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥
 
बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥7॥
 
आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥8॥
 
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥9॥
 
आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥10॥
 
अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥11॥
 
येऽ अग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥12॥
 
अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥13॥
 
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥14॥
 
आसीनासोऽ अरूणीनाम् उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरः तस्य वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात॥15॥
 
॥ ॐ शांति: शांति:शांति:॥
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