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पितृपक्ष में कुशा की अंगूठी पहनना क्यों माना जाता है जरूरी? जानिए नियम और महत्व

Tue, 22 Sep 2026 08:51 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण के दौरान कुशा की अंगूठी पहनने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कुशा को पवित्र माना जाता है और श्राद्ध कर्म में इसका विशेष महत्व बताया गया है। जानिए कुशा की अंगूठी का पितरों से क्या संबंध है और इसे पहनने के पीछे क्या मान्यता है।
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श्राद्ध पक्ष - फोटो : अमर उजाला

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों को समर्पित विशेष अवधि मानी जाती है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए इन कर्मों से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। पितृ पक्ष के दौरान होने वाले श्राद्ध कर्म में कई तरह की पूजन सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें कुशा घास को खास महत्व दिया गया है। तर्पण और पिंडदान जैसे कर्मों में कुशा का प्रयोग किया जाता है। परंपरा के अनुसार, कुशा से बनी अंगूठी को पवित्री कहा जाता है और इसे दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में धारण किया जाता है। आइए जानते हैं कि श्राद्ध में पवित्री पहनने की परंपरा क्यों है और इसका पितरों से क्या संबंध माना जाता है।

 

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श्राद्ध के समय क्यों पहनते हैं कुशा की अंगूठी? - फोटो : freepik

श्राद्ध के समय क्यों पहनते हैं कुशा की अंगूठी?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के दौरान दाहिने हाथ की अनामिका में कुशा या दर्भ घास से बनी अंगूठी पहनने का विधान बताया गया है। इसे पवित्री नाम दिया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध कर्म में पवित्री धारण करना शुद्धता और पवित्रता से जुड़ा माना जाता है। कुशा को पवित्र घास माना गया है और इसका इस्तेमाल कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध कर्म में कुशा का प्रयोग करने से पूजा और तर्पण की प्रक्रिया विधिपूर्वक पूरी होती है।

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पितरों से कुशा की अंगूठी का क्या संबंध है? - फोटो : Amar Ujala

पितरों से कुशा की अंगूठी का क्या संबंध है?
धार्मिक मान्यताओं में कुशा को अत्यंत पवित्र माना गया है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब गरुड़ देव अमृत लेकर आए थे, तब अमृत का कलश कुशा घास पर रखा गया था। इसी प्रसंग से कुशा को पवित्रता से जोड़कर देखा जाता है। ऐसी मान्यता भी है कि कुशा धारण करने से मन और शरीर की शुद्धता बनी रहती है। श्राद्ध जैसे धार्मिक कर्मों में इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरागत मान्यताओं में अनामिका उंगली को ऊर्जा के प्रवाह से भी जोड़ा गया है। इसी कारण पूजा और श्राद्ध कर्म के दौरान इस उंगली में कुशा की पवित्री पहनने की परंपरा बताई जाती है। श्राद्ध में तर्पण और पिंडदान के दौरान कुशा का इस्तेमाल पितरों के प्रतीकात्मक माध्यम के रूप में भी किया जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, कुशा के माध्यम से अर्पित जल और अन्य सामग्री पितरों तक पहुंचती है। यही वजह है कि श्राद्ध कर्म में कुशा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है

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कुशा घास का धार्मिक महत्व - फोटो : Amar Ujala

कुशा घास का धार्मिक महत्व

  • त्रिदेवों से संबंध: धार्मिक मान्यता के अनुसार, कुशा की जड़ में ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु और ऊपरी हिस्से में भगवान शिव का वास माना जाता है।
  • पवित्रता का प्रतीक: पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन और श्राद्ध जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा का प्रयोग शुभ और पवित्र माना जाता है।
  • ध्यान के लिए उपयोग: श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में ध्यान साधना के लिए कुशा से बने आसन का उल्लेख मिलता है।
  • ग्रहण के समय प्रयोग: पारंपरिक मान्यता के अनुसार, सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय भोजन और पेय पदार्थों में कुशा के तिनके रखने की परंपरा रही है। माना जाता है कि इससे खाद्य पदार्थों की शुद्धता बनाए रखने में मदद मिलती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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