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पापाकुंशा एकादशी के व्रत से नष्ट होते हैं सारे पाप, जानिए पूरी व्रत विधि

Thu, 15 Oct 2020 01:49 PM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
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पापांकुशा एकादशी 2020 (प्रतीकात्मक तस्वीर)
हर माह में कृष्ण पक्ष और शुक्ल दो पक्ष होते हैं दोनों पक्षों की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी कहते हैं इस तरह से साल में 24 एकादशी आती हैं। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की ग्याहरवीं तिथि को पापांकुशा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार 27 अक्तूबर को एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस एकादशी पर भगवान पद्मनाभ की पूजा की जाती है। इस एकादशी का व्रत करने से तप के समान फल प्राप्त होता है। जानते हैं क्यों कहते हैं इसे पापाकुंशा एकादशी क्या है इसका महत्व और व्रत विधि...

 
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पापांकुशा एकादशी 2020 महत्व (प्रतीकात्मक तस्वीर)
एकादशी महत्व
पापांकुशा एकादशी के महत्व को इसी बात से जाना जा सकता है कि महाभारत काल में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्म राज युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताई थी। इस व्रत को करने से मनुष्य के अशुभ संस्कारों का भी नाश हो जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से सूर्य यज्ञ और अश्वमेज्ञ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।  
 
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क्यों कहा जाता है पापांकुशा एकादशी (प्रतीकात्मक तस्वीर)
क्यों कहा जाता है पापांकुशा एकादशी
इस एकादशी का नाम पाप रुपी हाथी को पुण्यरुपी व्रत के अंकुश से भेदने के कारण इस व्रत का नाम पापांकुशा एकादशी पड़ा। इस दिन मौन रहकर भगवद् स्मरण और भगवान के कीर्तन-भजन करने का प्रावधान है। जिससे मनुष्य में सद्गुण आते हैं और उसका मन में निर्मलता आती है।  
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पापांकुशा एकादशी 2020 व्रत विधि (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : lord vishnu
जानें पूरी व्रत विधि
इसलिए दशमी तिथि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। दशमी तिथि वाले दिन सूर्योदय से पूर्व ही भोजन कर लेना चाहिए। रात के समय भोजन न करें ताकि एकादशी वाले दिन पेट में अन्न का अंश न रहे।
एकादशी के दिन अन्न का सेवन वर्जित माना गया है। यह व्रत निर्जला या फिर क्षमतानुसार फलाहार करके किया जा सकता है।

एकादशी को ब्रह्ममुहूर्त में उठे नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि करने के पश्चात् भगवान के समक्ष व्रत का संकल्प करें। उसके बाद एक पटरी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर उसपर भगवान विष्णु की तस्वीर रखें और कलश स्थापित करें। उसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। तत्पश्चात् श्री हरि विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।

एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि तो किया जाता है। रात्रि में भगवान के भजन कीर्तन और स्मरण करें। प्रातः उठकर पूजा पाठ करने के बाद ब्राह्मण को भोजन करवाएं उन्हें दान दक्षिणा देकर विदा करें। उसके बाद स्वयं व्रत का पारण करें।
 
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