तिरुपति संसार का सबसे संपन्न मंदिर है, उससे भी बड़ा सच यह है कि यहां के अधिष्ठाता देव विष्णु सबसे ज्यादा जीवंत और जागृत देव के रूप में प्रतिष्ठित हैं। लोगों का विश्वास है कि तिरुपति अर्थात श्रीपति विष्णु शिव की तरह अवढ़रदानी हैं। भक्तगण जो भी मांगते हैं उनकी मुराद पूरी होती है।
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तिरुपति मंदिर के 5 सच से आप अब तक अनजान तो नहीं
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एक जनश्रुति के अनुसार ऎसा माना जाता है कि इस मंदिर में दान की परम्परा विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय के समय से चली आ रही है। राजा कृष्णदेवराय इस मंदिर में हीरे-जवाहारात-सोना-चाँदी आदि का बहुत दान करते थे। उसी समय से इस मंदिर में भक्तों द्वारा बहुत दान दिया जा रही है।
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तिरुपति बारे में पुराणों ने अलग महत्व बताया है। स्कंद पुराण में इस मंदिर के बारे में बताया गया है कि तिरुपति का केवल ध्यान करने से व्यक्ति की आने वाली कई पीढ़ियों का कल्याण हो जाता है। वाराह पुराण के अनुसार तिरुमाला पर्वत को वाराह क्षेत्र कहते हैं। पुराण के अनुसार यहां पुष्करणी नाम की परम पवित्र नदी है। नदी के तट पर विष्णु ने श्रीनिवास भगवान के रुप में जन्म लिया था। पुराणों के अनुसार वेंकटम पर्वत को विष्णु के वाहन गरुड़ द्वारा भूमि पर लाया गया था।
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भविष्यपुराण के अनुसार विष्णु जब अपने शयनकक्ष में सो रहे थे तो महर्षि भृगु ने उनकी छाती पर जोर से प्रहार किया था। इस पर लक्ष्मी को बहुत दुख हुआ। वे दुखी हो कर वहां से चले जाने पर विष्णु को बहुत दु:ख हुआ और वे तिरुमाला पर्वत पर निवास करने लगे। तिरुपति का सम्पूर्ण क्षेत्र विष्णु को वैकुंठ धाम के बाद सबसे ज्यादा प्रिय है।
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तिरुपति सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख त्यौहार है-ब्रह्मोत्सवम। ब्रह्मोत्सवम के अतिरिक्त इस मंदिर में अधिकामासम, तपोत्सव, वसंतोत्सव आदि पर्व भी मनाए जाते हैं। लेकिन ब्रह्मोत्सव बेहद महिमामय माना जाता है। सूर्य के कन्या राशि में आने पर होने वाले इस उत्सव में तिरुपति को उनके भी आभूषणों से सजाया जाता है। उपरोक्त चित्र की तरह भव्य लगने वाली छवि उसी अवसर की है।