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Akshaya Tritiya: अक्षय तृतीया पर हुआ था भगवान विष्णु का यह अवतार, परशु से बनी पहचान

Mon, 25 Apr 2022 05:04 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमरउजाला, नई दिल्ली
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अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है।
Akshaya Tritiya: हिन्दू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ‘अक्षय तृतीया’ कहा जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह दिन केवल एक पर्व ही नहीं बल्कि एक बड़े त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। अक्षय तृतीया के रंग विभिन्न रूप में हिन्दुओं के बीच नज़र आते हैं। ये तिथि बहुत ही पुण्यदायिनी मानी गई है। इस दिन सोना खरीदना काफी शुभ माना जाता है। खरीदारी करने के साथ ही इस दिन दान कर्म करने का बहुत अधिक महत्व होता है। साथ ही अक्षय तृतीया पर किए गए दान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। किसी भी मांगलिक कार्य के लिए ये दिन काफी शुभ माना जाता है। इस दिन बिना मुहूर्त के शादी-विवाह आदि मांगलिक कार्य किए जाते हैं। पुराणों के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान विष्णु ने अपना 6वां अवतार लिया था। वह उनका आवेशावतार भगवान परशुराम थे। इस वजह से अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है। महर्षि जमदग्नि ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया और देवराज इन्द्र को प्रसन्न कर पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया। महर्षि की पत्नी रेणुका ने वैशाख शुक्ल तृतीय पक्ष में परशुराम को जन्म दिया था। इस साल अक्षय तृतीया 03 मई दिन मंगलवार को मनाई जा रही है। आइए जानते हैं परशुराम जी से जुड़ी हुई कुछ खास बातें। 
 
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भारत के पश्चिमी तट पर कई मंदिर हैं जो भगवान परशुराम को समर्पित हैं। - फोटो : Social media
अन्य सभी अवतारों के विपरीत हिंदू आस्था के अनुसार परशुराम अभी भी पृथ्वी पर रहते है। इसलिए, राम और कृष्ण के विपरीत परशुराम की पूजा नहीं की जाती है। दक्षिण भारत में, उडुपी के पास पजका के पवित्र स्थान पर, एक बड़ा मंदिर मौजूद है जो परशुराम का स्मरण करता है। भारत के पश्चिमी तट पर कई मंदिर हैं जो भगवान परशुराम को समर्पित हैं।
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भगवान शिव के परमभक्त परशुराम न्याय के देवता हैं। इन्होंने 21 बार इस धरती को क्षत्रिय विहीन किया था। - फोटो : Social media
भगवान राम और परशुराम दोनों ही विष्णु के अवतार हैं। भगवान राम क्षत्रिय कुल में पैदा हुए लेकिन उनका व्यवहार ब्राह्मण जैसा था। वहीं भगवान परशुराम का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ, लेकिन व्यवहार क्षत्रियों जैसा था। भगवान शिव के परमभक्त परशुराम न्याय के देवता हैं। इन्होंने 21 बार इस धरती को क्षत्रिय विहीन किया था। यही नहीं इनके क्रोध से भगवान गणेश भी नहीं बच पाए थे।

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इनके क्रोध से भगवान गणेश भी नहीं बच पाए थे।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार परशुराम भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे, लेकिन प्रथम पूज्य शिव-पार्वती पुत्र भगवान गणेश ने उन्हें शिवजी से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने अपने परशु से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ा डाला। इस कारण से भगवान गणेश एकदंत कहलाने लगे।
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परशुराम को अनेक नामों जैसे रामभद्र, भृगुपति, भृगुवंशी आदि से जाना जाता है। - फोटो : सोशल मीडिया।
परशुराम का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है। परशु का मतलब है कुल्हाड़ी और राम, अर्थात कुल्हाड़ी के साथ राम। जैसे राम भगवान विष्णु के अवतार है, वैसे ही परशुराम भी भगवान विष्णु के अवतार हैं और उन्हीं की तरह ही शक्तिशाली भी हैं। परशुराम को अनेक नामों जैसे रामभद्र, भृगुपति, भृगुवंशी आदि से जाना जाता है।
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भगवान परशुराम ने अपने पिता का आदेश पाते ही तुरंत अपने परशु से अपनी मां का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया। - फोटो : Social media
भगवान परशुराम बेहद आज्ञाकारी पुत्र थे। उन्होंने अपने पिता का आदेश पाते ही तुरंत अपने परशु से अपनी मां का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया। अपनी आज्ञा का पालन होते देख भगवान परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि अपने पुत्र से बेहद प्रसन्न हुए। पिता को प्रसन्न  देख परशुराम ने अपने पिता से माता को पुनःजीवित करने का वरदान मांगकर अपनी मां को नवजीवन प्रदान किया। 
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भगवान दत्तात्रेय के मार्गदर्शन से योद्धा ऋषि परशुराम को शास्त्रों का ज्ञान हुआ।  - फोटो : Social media
कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय के मार्गदर्शन से योद्धा ऋषि परशुराम को शास्त्रों का ज्ञान हुआ। इसके बाद उन्होंने सांसारिक गतिविधियों का त्याग कर दिया। इस प्रकार उन्हें मृत्यु और पुनर्जन्म के कर्म चक्र से मुक्ति मिल गई। महाभारत में भी इस बात का जिक्र है कि क्षत्रियों के नरसंहार के बाद परशुराम खुद हताश हो गए थे और इसके बाद वो एक सन्यासी बन गए थे। 
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