फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Holi 2020: जानिए होली पर क्यों होता है रंग और गुलाल का प्रयोग

Tue, 10 Mar 2020 08:53 AM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 6
होली का सीधा मतलब रंग और गुलाल के संग मस्ती है इसलिए होली आने से हफ्ते दिन पहले ही लोग रंग गुलाल के साथ मौज मस्ती करने लगते हैं। रंग और गुलाल लगाते समय इस बात का किसी को ख्याल ही नहीं रहता कि कौन अपना है कौन पराया है सभी होली पर एक रंग में रंग जाते हैं यह रंग होता है प्यार और आनंद का रंग। होली पर रंगों का हुड़दंग कैसे आम लोगों के जीवन में आया इसका जवाब आपने कभी ढूंढा है। आइये आज उन पांच कारणों के बारे में जानें जिससे होली पर रंगों के संग हुड़दंग चलता है।
विज्ञापन

2 of 6
होली के बारे में सबसे प्रचलित कहानी है प्रह्लाद और होलिका की। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को ब्रह्मा जी से वरदान स्वरूप एक वस्त्र प्राप्त था जिसे ओढने के बाद आग उसे नहीं जला पाती। इस वरदान का लाभ उठाकर हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु के भक्त और अपने पुत्र प्रह्लाद को  मरवाना चाहा। इसके लिए होलिका लकड़ियों के ढ़ेर पर प्रह्लाद को लेकर बैठ गई। लकड़ियों में जब आग लगाई गई तब हवा के झोंके से अग्नि से रक्षा करने वाला वस्त्र उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गया इससे प्रह्लाद जीवित बच गया और होलिका जलकर मर गई। लोगों को जब इस घटना की जानकारी मिली तो अगले दिन लोग खूब रंग गुलाल के संग आनंद उत्सव मनाए। इसके बाद से ही होली पर रंग गुलाल संग मस्ती की परंपरा शुरु हो गई।
विज्ञापन

3 of 6
- फोटो : holi 2020
होली पर उत्सव मनाने की दूसरी वजह भगवान शिव और देवी पार्वती की पहली मुलाकात है। कथा के अनुसार तारकासुर का वध करने के लिए भगवान शिव और पार्वती का विवाह आवश्यक था। लेकिन भगवान शिव तपस्या में लीन थे। ऐसे में भगवान शिव से देवी पार्वती को मिलाने के लिए देवताओं ने कामदेव और रति का सहारा लिया। कामदेव ने भगवान शिव का ध्यान भंग कर दिया इससे नाराज होकर शिव ने कामदेव को भष्म कर दिया। लेकिन इस घटना में शिव जी ने पहली बार देवी पार्वती को भी देखा। कामदेव के भष्म होने के बाद रति ने विलाप करना शुरु कर दिया। देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने कामदेव को बिना शरीर के रति के साथ रहने का आशीर्वाद दिया और कामदेव को पुनः शरीर की प्राप्ति श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में हुआ। शिव पार्वती के मिलन और कामदेव को पुनः जीवन मिलने की खुशी में देवताओं ने रंगोत्सव मनाया।

4 of 6
पूतना नामक राक्षसी को कंस ने श्री कृष्ण के वध के लिए भेजा। पूतना ने श्री कृष्ण का अपहरण कर लिया और अपने जहरीले दूध का स्तनपान कराने लगी। श्री कृष्ण ने स्तनपान करते समय पूतना के प्राण छीन लिए और उसकी मृत्यु हो गयी। लोगों ने जब पूतना के शरीर पर श्री कृष्ण को जीवित खेलते हुए देखा तो आनंद से झूम उठे। पूतना का अंतिम संस्कार किया गया और रंगोत्सव मनाया गया। इसी परंपरा को मनाते हुए आज भी गोकुलवासी रंग गुलाल से होली खेलते हैं।
विज्ञापन

5 of 6
श्री कृष्ण की लीलाओं में राधा के संग होली खेलने की भी कथाएं मिलती हैं। भगवान श्री कृष्ण राधा के गांव बरसाने जाकर गोपियों संग होली खेलते थे। बरसाने वाले इसके अगले दिन नंदगांव आकर होली का उत्सव मनाते थे। इसी परंपरा के तहत आज भी बरसाने और नंद गांव में रंग गुलाल के साथ लट्ठमार होली खेली जाती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
होली के रंग उत्सव और हुड़दंग के पीछे एक कहानी ढुंढी नाम की राक्षसी का है। इस राक्षसी ने राजा पृथु के राज में हहाकार मचा रखा था। भगवान शिव के वरदान के कारण इसकी मृत्यु अस्त्र-शस्त्र से नहीं हो सकती थी। वरदान के कारण यह लोगों को सताती थी छोटे बच्चों को खा जाती थी। लेकिन वरदान के साथ एक शर्त यह थी कि वह बच्चों के आनंद और शोर से मुक्त नहीं थी। इसलिए पुरोहितों की सलाह पर पृथु ने फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन सभी बच्चों को इक्टठा किया और सभी को खूब शोर मचाने और मौज मस्ती करने के लिए कहा गया। ढूंढी राक्षसी जब वहां पहुंची तो बच्चों ने लकड़ी जालाकर खूब शोर मचाना शुरु किया इससे ढूंढी भाग गई। इसके बाद लोगों ने चैन की सांस ली और खूब हुड़दंग मचाते हुए रंग गुलाल उड़ाए। राजा पृथु को पृथ्वी का पहला राजा भी माना जाता है और इन्हीं के नाम पर धरती पृथ्वी कहलाती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें