भीष्म श्रृंगार एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है, जिसे हर साल शीतकालीन बंदी से पहले विधि-विधान के साथ किया जाता है।
- फोटो : ANI
भीष्म श्रृंगार का रहस्य
केदारनाथ धाम में भीष्म श्रृंगार एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है, जिसे हर साल शीतकालीन बंदी से पहले विधि-विधान के साथ किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी कर्नाटक के वीरशैव लिंगायत समुदाय के पुजारियों के पास होती है, जो पीढ़ियों से इस सेवा को निभाते आ रहे हैं। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है और इसमें करीब 5 घंटे का समय लगता है। सबसे पहले बाबा केदारनाथ के स्वयंभू शिवलिंग को शुद्ध किया जाता है, जिसके बाद उस पर शुद्ध घी का लेपन किया जाता है। इसके बाद शिवलिंग को सफेद सूती कपड़े से पूरी तरह ढक दिया जाता है। यह परत बर्फ, ठंड और कठोर मौसम से शिवलिंग की रक्षा करने के लिए होती है। श्रृंगार पूरा होने के बाद बाबा केदार को विशेष भोग अर्पित किया जाता है, जिसमें मौसमी फल और ड्राई फ्रूट्स शामिल होते हैं। इस भोग को ‘आर्घा’ कहा जाता है। इसके पश्चात वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं, और बाबा केदारनाथ की डोली को उनके शीतकालीन गद्दीस्थल की ओर ले जाया जाता है।