फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जीवनभर किया धन-संपत्ति का दान, फिर भी कर्ण को स्वर्ग में क्यों नहीं मिला भोजन? पितृ पक्ष से जुड़ी है ये कथा

Mon, 05 Oct 2026 01:29 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

पितृ पक्ष से जुड़ी कर्ण की कथा महाभारत की एक महत्वपूर्ण पौराणिक कहानी मानी जाती है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जब कर्ण पितृलोक पहुंचे, तो उन्हें अन्न के बजाय सोना दिया गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ और इसका पितृ पक्ष में श्राद्ध व अन्नदान से क्या संबंध है? जानें पूरी कथा।

विज्ञापन
1 of 6
कर्ण और श्राद्ध का संबंध - फोटो : AI

Pitru Paksha 2026: महाभारत में कर्ण को महान दानवीरों में गिना जाता है। उनकी दानशीलता की ऐसी अनेक कथाएं मिलती हैं, जिनमें बताया गया है कि उन्होंने कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। धन-दौलत और सोने से लेकर अपना कवच-कुंडल तक उन्होंने दान कर दिया था। लेकिन पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के बाद जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे तो उन्हें एक ऐसी कमी का सामना करना पड़ा, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। उन्हें भोजन उपलब्ध नहीं हो रहा था। आखिर ऐसा क्यों हुआ और उनके जीवनभर किए गए दान के बावजूद उन्हें अन्न क्यों नहीं मिला? आइए जानते हैं पितृ पक्ष से जुड़ी कर्ण की यह प्रसिद्ध कथा।

विज्ञापन

2 of 6
कर्ण और श्राद्ध का संबंध - फोटो : ai

कर्ण को स्वर्ग में भोजन क्यों नहीं मिला?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद कर्ण की मृत्यु हुई और वे स्वर्ग पहुंचे। वहां उन्हें तमाम सुख-सुविधाएं तो प्राप्त हुईं, लेकिन जब भोजन की बात आई तो उन्हें अन्न नहीं मिला। यह देखकर कर्ण हैरान रह गए। उन्होंने देवताओं से इसका कारण जानना चाहा। तब उन्हें बताया गया कि जीवन में उन्होंने अपार धन, सोना और दूसरी मूल्यवान वस्तुओं का दान किया था, लेकिन अपने पितरों के लिए अन्न और जल का दान नहीं किया था। धार्मिक मान्यता में पितरों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध और अन्नदान को अलग महत्व दिया गया है।

विज्ञापन

3 of 6
धन-संपत्ति का दान किया, लेकिन पितरों के लिए अन्न नहीं दिया - फोटो : adobe stock

धन-संपत्ति का दान किया, लेकिन पितरों के लिए अन्न नहीं दिया
कर्ण की पहचान ही उनके उदार स्वभाव से थी। कहा जाता है कि उनके पास जो भी व्यक्ति सहायता की उम्मीद लेकर आता, वह उसे निराश नहीं करते थे। जरूरत पड़ने पर उन्होंने अपनी सबसे कीमती वस्तुएं तक दान कर दीं। हालांकि, पौराणिक कथा के अनुसार कर्ण ने अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म और अन्नदान नहीं किया था। अन्न को जीवन का आधार माना गया है और पितरों के निमित्त अन्न व जल अर्पित करने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कमी के कारण कर्ण को स्वर्ग में भोजन प्राप्त नहीं हुआ, ऐसी धार्मिक मान्यता है।

4 of 6
कर्ण और श्राद्ध का संबंध - फोटो : ai

कर्ण ने देवताओं को अपनी मजबूरी बताई
जब कर्ण को इस बात का पता चला कि भोजन न मिलने का कारण क्या है, तो उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट की। कथा के अनुसार, उन्हें अपने वास्तविक जन्म और वंश से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें जीवन के काफी बाद में पता चली थीं। इसी वजह से वे अपने पितरों के लिए उन कर्मों को नहीं कर सके, जिन्हें सामान्य रूप से पुत्र का कर्तव्य माना जाता है। कर्ण ने देवताओं से इस समस्या का समाधान पूछा और अपने पितरों के लिए श्राद्ध करने का अवसर मांगा।

विज्ञापन

5 of 6
पृथ्वी पर लौटकर किया श्राद्ध और अन्नदान - फोटो : freepik

पृथ्वी पर लौटकर किया श्राद्ध और अन्नदान
पौराणिक कथा के अनुसार, कर्ण को एक निश्चित अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस आने का अवसर दिया गया। इस दौरान उन्होंने अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म किया और अन्न, जल सहित आवश्यक वस्तुओं का दान किया। मान्यता है कि श्राद्ध और अन्न-जल अर्पित करने के बाद कर्ण की समस्या दूर हो गई और उन्हें स्वर्ग में भोजन प्राप्त होने लगा। इसी कथा को पितृ पक्ष में श्राद्ध और अन्नदान के महत्व से जोड़कर देखा जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
कर्ण और श्राद्ध का संबंध - फोटो : ai

पितृ पक्ष से कैसे जुड़ी कर्ण की यह कथा?
कर्ण से जुड़ी यह कहानी पितृ पक्ष की प्रचलित पौराणिक कथाओं में शामिल है। पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करते हैं और उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा अन्न-जल का दान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में अन्न को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यह जीवन का आधार है। श्राद्ध कर्म में पितरों के लिए भोजन, जल और अन्य सामग्री अर्पित करने की परंपरा इसी भाव से जुड़ी मानी जाती है। विष्णु पुराण समेत कई धार्मिक ग्रंथों में भी श्राद्ध के दौरान पितरों को अन्न आदि अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इस तरह कर्ण की कथा यह संदेश देती है कि पितरों का स्मरण और उनके निमित्त किया गया श्राद्ध केवल दान की वस्तु से नहीं, बल्कि श्रद्धा, कृतज्ञता और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा कर्म माना जाता है। यह कथा धार्मिक मान्यता पर आधारित है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें