जीवित्पुत्रिका व्रत कथा
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एक दिन वन में भ्रमण करते हुए उनकी भेंट एक वृद्धा से हुई, जो नागवंश से थी। वह काफी डरी हुई थी और रो रही थी। दयालु जीमूतवाहन ने उससे उसकी ऐसी स्थिति के बारे में पूछा। इस पर वृद्धा ने बताया कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को वचन दिया है कि प्रत्येक दिन वे एक नाग को उनके आहार के रूप में देंगे। रोते हुए वृद्धा ने बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास जाना है। इस पर जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा कि डरो मत, तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूंगा। आज तुम्हारे पुत्र की जगह स्वयं को लाल कपड़े से ढक कर शिला पर लेटूंगा। नियत समय पर जीमूतवाहन पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए। लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को गरुड़ अपने पंजों में दबोच कर साथ लेकर चल दिए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन की आंखों में आंसू निकलते देखा और कराहते हुए सुना। वे एक पहाड़ पर रुके, तो जीमूतवाहन ने सारी घटना बताई।