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Jagannath Rath Yatra: रथ यात्रा के चौथे दिन क्यों तोड़ा जाता है रथ का पहिया? जानें क्या है हेरा पंचमी पूरी कथा

Mon, 20 Jul 2026 01:31 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Jagannath Rath Yatra 2026: रथ यात्रा के दौरान मनाई जाने वाली हेरा पंचमी एक विशेष धार्मिक परंपरा है। इस दिन भगवान जगन्नाथ के रथ का पहिया प्रतीकात्मक रूप से तोड़ा जाता है। जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा, धार्मिक मान्यता और महत्व।
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jagannath rath yatra - फोटो : amar ujala

Hera Panchami 2026: पुरी की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा केवल रथ खींचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई धार्मिक परंपराएं और अनुष्ठान भी विशेष महत्व रखते हैं। इन्हीं में से एक है हेरा पंचमी, जिसे रथ यात्रा के चौथे दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त किया जाता है। यह कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा है, जो मां लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ की एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है।

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jagannath rath yatra - फोटो : jagannath rath yatra

20 जुलाई 2026 को निभाई जाएगी हेरा पंचमी की परंपरा
वर्ष 2026 में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू हुई। रथ यात्रा के चौथे दिन यानी 20 जुलाई 2026 को हेरा पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ के पहिए को प्रतीकात्मक रूप से थोड़ा-सा क्षतिग्रस्त किया जाता है। इसके बाद मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

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क्यों तोड़ा जाता है रथ का पहिया? - फोटो : PTI

क्यों तोड़ा जाता है रथ का पहिया?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं, तब वे मां लक्ष्मी से शीघ्र लौटने का वचन देते हैं। लेकिन गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद वे कई दिनों तक वहीं विराजमान रहते हैं और समय पर वापस नहीं लौटते। भगवान के लौटने में विलंब होने पर मां लक्ष्मी उनसे नाराज हो जाती हैं। वे पालकी में बैठकर गुंडिचा मंदिर तक पहुंचती हैं, लेकिन वहां भी उनकी भगवान जगन्नाथ से भेंट नहीं हो पाती। क्रोधित होकर मां लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ के पहिए को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त कर देती हैं, ताकि रथ आगे न बढ़ सके।

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जगन्नाथ रथ यात्रा - फोटो : Adobe Stock

कैसे समाप्त होता है यह प्रसंग?
जब भगवान जगन्नाथ को मां लक्ष्मी की नाराजगी का पता चलता है, तो वे उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं और जल्द श्रीमंदिर लौटने का आश्वासन देते हैं। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पंचमी के दिन हेरा पंचमी की यह परंपरा निभाई जाती है। पुरी के मंदिर के सेवायत और पुजारी इस अनुष्ठान को विधि-विधान से संपन्न कराते हैं। हेरा पंचमी केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ और मां लक्ष्मी के स्नेह, मान-मनुहार और दांपत्य भाव का सुंदर प्रतीक भी मानी जाती है। यही कारण है कि रथ यात्रा के दौरान इस परंपरा का विशेष महत्व होता है और श्रद्धालु इसे बड़ी श्रद्धा के साथ देखते हैं।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

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