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आखिर हरिद्वार के ब्रह्मकुंड पर ही क्यों होता है अस्थि विसर्जन?

Sun, 19 Aug 2018 08:48 AM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
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सनातन पंरपरा में व्यक्ति जीवन की शुरुआत से लेकर अंतिम यात्रा तक गंगा से जुड़ा रहता है। जीते जी कोई पाप से मुक्ति के लिए तो कोई मोक्ष की कामना लेकर गंगा में डुबकी लगाता है। वहीं अंतिम संस्कार के बाद उसकी अस्थियां तक इसी गंगा में प्रवाहित कर दी जाती हैं। 
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जब पृथ्वी पर हुआ गंगा का अवतरण 
हरिद्वार के तीर्थ पुरोहित उज्जवल पंडित बताते हैं कि हरिद्वार हमेशा से ऋषि-मुनियों की तपस्थली रही है। हरिद्वार की हरि की पौड़ी में अस्थि विसर्जन बहुत ज्यादा महत्व है। उज्जवल बताते हैं कि राजा सागर के वंशज राजा भागीरथ ने  अपने पुरखों के उद्धार के लिए कठिन तपस्या की तथा मां गंगा को धरती पर लाये। 
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स्पर्श मात्र से मिलता है मोक्ष
स्वर्ग से उतरकर मां गंगा भगवान शिव जी की जटाओं से होते हुए राजा भागीरथ के पीछे पीछे चल पड़ीं। जब राजा भागीरथ गंगा नदी को लेकर हरिद्वार पहुंचे तो सागर पौत्रों के भस्म हुए अवशेष को गंगा के स्पर्श मात्र से मोक्ष प्राप्त हो गया। उसी समय से हरिद्वार के इस पावन घाट अस्थि विसर्जन होने लगा। मान्यता है कि जब तक गंगा में व्यक्ति की अस्थियां रहती हैं तब तक वह स्वर्ग का अधिकारी बना रहता है। इसी पवित्रता को ध्यान में रखकर अंतिम समय में भी व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाला जाता है।

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ऐसे मिला ब्रह्मा का वरदान
पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा स्वेत ने हर की पौड़ी में भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उनसे वरदान मांगने को कहा था। तब राजा स्वेत ने उनसे हर की पौड़ी को ईश्वर के नाम से जाना जाए, ऐसा वरदान मांगा। उसी समय से हर की पौड़ी के पानी को ब्रह्मकुंड के नाम से जाना जाता है।
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अनिष्ट की आशंका का होता है अंत
माना जाता है कि अनिष्टकारी शक्तियों जैसे भूत-प्रेत आदि के लिए अस्थियों तथा सूक्ष्म-देह पर नियंत्रण कर उनका दुरुपयोग करना आसान होता है। ऐसे में यदि अस्थियां भूमि पर एक साथ मिल जाएं, तो उनके द्वारा अनिष्ट की आशंका बढ़ जाती है। वहीं पवित्र नदी या समुद्र आदि के जल में अस्थि विसर्जन करने से अस्थियां जल में बिखर जाती हैं। ऐसे में अनिष्टकारी शक्तियों को एकत्रित नहीं हो पाती हैं। 
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