गुरु द्वारा आज देश और धर्म की रक्षा की शिक्षा क्यों देनी चाहिए ?
- ईश्वर प्राप्ति के लिए साधकों को साधना बताना, जैसे सांप्रत काल में गुरु का धर्म है वैसे ही राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए समाज को जगाना भी गुरु का आपातकालीन धर्म है ।
- गुरु शिष्य को जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त होने के लिए साधना सिखाते हैं। किन्तु यदि राष्ट्र और धर्म सुरक्षित नहीं हैं तो साधना कैसे हो सकती है? इसके लिए गुरु का कर्तव्य है कि वह न केवल शिष्यों में अपितु हर देशभक्त में राष्ट्रीय चरित्र और धर्म प्रेम का निर्माण करे ।
- माया में रह कर साधना करते हुए गुरु अपनी दिव्यता अर्थात देवत्व को जागृत करते हुए ब्रम्हत्व को प्राप्त करते है । अपने स्वयं के देवत्व को जागृत रखते हुए 'दूसरे में देवत्व देखना' गुरु की साधना की आगे की यात्रा होती है । तो क्या गुरु उस व्यक्ति के बारे में कुछ अनुभव नहीं करेंगे जिसमें वह देवत्व देखना चाहते हैं ? यदि धर्मबन्धुओं को सताया जा रहा है, तो क्या गुरु को उनके लिए खेद नहीं होगा ? यदि राष्ट्र पीड़ित है तो क्या गुरु स्वस्थ जीवन जी सकते हैं ?
संक्षेप में, आज गुरु का मुख्य कर्तव्य शिष्यों और समाज के समय की आवश्यकता को पहचानते हुए राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए साधना करना सिखाना है । राष्ट्र और धर्म की रक्षा, यह उनकी, साथ ही शिष्य और समाज की भी कार्यानुसार साधना ही है । सन्दर्भ : सनातन द्वारा निर्मित ग्रंथ 'गुरु का महत्व, प्रकार और गुरु मंत्र
कु. कृतिका खत्री,
सनातन संस्था, दिल्ली