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Garuda Purana: मां के गर्भ में इस तरह के कष्टों को झेलता है शिशु, गरुड़ पुराण में है इसका पूरा उल्लेख

Fri, 09 Jul 2021 11:50 AM IST
संकल्प सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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गरुड़ पुराण - फोटो : social media
गरुड़ पुराण हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों में से एक है। हमारी सनातन संस्कृति में इसका एक खास स्थान है। इस पवित्र ग्रंथ में जीवन के बारीक से बारीक पहलुओं का खुल कर वर्णन किया गया है। इसमें आपको जीवन के उन रहस्यों के बारे में भी पता चलेगा, जिससे हम अनभिज्ञ हैं। मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता? आत्मा कैसे गर्भ धारण करती है? गर्भ धारण करने के बाद शिशु को उसके भीतर किस तरह के कष्टों को झेलना पड़ता है? इन सब बातों का विस्तृत उल्लेख गरुड़ पुराण में मिलता है। आपको बता दें कि माता के गर्भ में प्रवेश करने के बाद आत्मा मृत्युलोक की वायु को स्पर्श करती है। इस दौरान आत्मा अपने पूर्व जन्म की सभी यादों को भूल जाती है। गर्भधारण करने के बाद आत्मा एक नए जीवन की शुरुआत करती है। गरुड़ पुराण के मुताबिक गर्भ के भीतर शिशु को कई प्रकार के कष्टों को सहन करना पड़ता है। आइए जानते हैं -
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गरुड़ - फोटो : Social media
गरुड़ पुराण के अनुसार जब आत्मा जीव के रास्ते गर्भ में प्रवेश करती है। उस वक्त जीव का आकार बहुत ही सूक्ष्म होता है। यही कुछ 10 दिनों के बाद वह एक बेर के समान हो जाता है। धीरे-धीरे गर्भ के भीतर उसका विकास होने लगता है और वह एक अंडे के आकार में बदल जाता है। इसके बाद भ्रुण के मस्तिष्क का विकास होता है। दूसरे महीने में शिशु की भुजा बननी शुरू होती है। 
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गरुड़ पुराण - फोटो : Social media
तीसरे महीने में शिशु के नाखून, रोम, लिंग, त्वचा, हड्डी और दस द्वार के छिद्र बनते हैं। चौथे महीने में शिशु के मांस, रुधिर, तव्चा, मज्जा और अस्थि तैयार होती है।  पांचवे महीने में तृषा और क्षुधा बनती है। छठे महीने में शिशु गर्भ के भीतर हिलने लगता है। मां द्वारा मिल रहे आहार को पाकर शिशु तेजी से विकसित होता है। 

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भगवान विष्णु - फोटो : ANI
इस दौरान गर्भ के भीतर शिशु मल-मूत्र और सूक्ष्म जीवों के साथ रहता है। गर्भावस्था के इस पड़ाव पर सूक्ष्म जीव शिशु को खूब परेशान करते हैं, जिसके चलते वह बार-बार बेहोश होता है। इस समय मां अगर कसैला या तीखे भोजन का सेवन करती है तो शिशु की नाजुक त्वचा को काफी कष्ट पहुंचता है।  
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भगवान विष्णु - फोटो : अमर उजाला
इस अवस्था में शिशु के पैर ऊपर और सिर नीचे होता है। ऐसे में वह हिल डुल नहीं पाता है। इस पड़ाव पर उसे कई कष्टों का सामना करना पड़ता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि इस दौरान शिशु भगवान से अपने पापों की क्षमा मांगता और उनके शरण में जाने की प्रार्थना करता है। वहीं जैसे ही उसका जन्म होता है और वह मृत्युलोक की वायु को छूता है। शिशु दोबारा सब कुछ भूल कर माया चक्र में फंस जाता है।
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