गणेश उत्सव देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि अलग-अलग राज्यों में इसकी अवधि, पूजा-पद्धति और परंपराएं अलग हैं। कहीं भव्य पंडाल सजते हैं, तो कहीं घरों में बप्पा की पूजा होती है। आइए विस्तार से जानते हैं भारत के अलग-अलग राज्यों में बप्पा का पर्व कैसे मनाया जाता है।
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महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक ऐसे मनाते हैं बप्पा का उत्सव
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गणेश उत्सव संपूर्ण भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। अलग-अलग राज्यों में इस पर्व की समयावधि, परंपराएं और सांस्कृतिक खासियतें भिन्न देखने को मिलती हैं। कई स्थानों पर भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन तीसरे या पांचवें दिन कर दिया जाता है, जबकि अधिकांश राज्यों में यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी (10वें दिन) को विसर्जन होता है। देश के किसी भी हिस्से में गणेश उत्सव मनाया जा रहा हो, भव्य और कलात्मक झांकियों का निर्माण इस पर्व की एक समान (कॉमन) और सबसे प्रमुख विशेषता है।
हालांकि मिजोरम, नागालैंड और मेघालय जैसे ईसाई बहुल राज्यों में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धूम भले ही न दिखे, लेकिन वहाँ रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के लोग पूरी निष्ठा के साथ अपने घरों और स्थानीय मंदिरों में गणेश पूजन आयोजित करते हैं।
महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गणेश उत्सव
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महाराष्ट्र अवधि: 3, 5 और 10 दिन (गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक)। खासियत: यह गणेशोत्सव का मुख्य केंद्र है। मुंबई और पुणे के बड़े सार्वजनिक पंडाल (जैसे लालबागचा राजा, श्रीमंत दगडूशेठ) विश्व प्रसिद्ध हैं। 'आगमन सोहला', ढोल-ताशा पथक, पारंपरिक पोशाक (नौवारी साड़ी और कुर्ता-पायजामा) और लालबाग-गिरगांव चौपाटी पर होने वाला भव्य विसर्जन यहाँ की पहचान है। खूबसूरत पंडाल और 'लालबागचा राजा' के दर्शन यहाँ की सबसे बड़ी पहचान हैं।
गोवा अवधि: 2 से 7 दिन (कुछ स्थानों पर 21 दिन तक)। खासियत: गोवा में इसे 'चवथ' (Chovoth) कहा जाता है। यहाँ घर-घर में मिट्टी की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और 'माटोली' (फलों, फूलों और जंगली वनस्पतियों की विशेष सजावट) बनाई जाती है। यह पूरी तरह से पारंपरिक और पारिवारिक उत्सव होता है। यह मुख्य रूप से घर-परिवार में मनाया जाने वाला त्योहार है, जिसमें पूजा स्थल को फलों और फूलों (माटोली) से सजाया जाता है।
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश / तेलंगाना अवधि: 3 से 11 दिन। खासियत: कर्नाटक: यहाँ गणेश चतुर्थी को 'गौरी हब्बा' (Gouri Habba) के साथ जोड़ा जाता है, जिसमें गणेश चतुर्थी से एक दिन पूर्व माता गौरी (पार्वती) की पूजा की जाती है। बेंबाप्पा को 'कड़ाबू' (विशेष मोदक) का भोग लगाया जाता है। गलुरु और हुबली के पंडाल काफी भव्य होते हैं। तेलंगाना में हैदराबाद का 'खैराताबाद गणेश' अपनी विशाल और विशालकाय प्रतिमा की ऊंचाई के लिए प्रसिद्ध है। हुसैन सागर झील में भव्य विसर्जन जुलूस निकाला जाता है।
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तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गणेश उत्सव
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तमिलनाडु और केरल अवधि: 1 से 3 दिन। खासियत: तमिलनाडु में इसे 'विनायक चतुर्थी' कहा जाता है। यहाँ मंदिरों और घरों में क्ले (सफेद मिट्टी) की इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं बनाकर पूजन किया जाता है। केरल में तिरुवनंतपुरम और कोच्चि के प्रमुख मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन होता है। बाप्पा को विशेष मोदक (कोझुकट्टई) चढ़ाया जाता है।
पश्चिम बंगाल और ओडिशा अवधि: 1 से 3 दिन। खासियत: यहाँ गणेश पूजन बड़े शैक्षणिक संस्थानों, कला केंद्रों और व्यावसायिक परिसरों में विशेष रूप से किया जाता है। पूजा पंडालों की सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होते हैं।
मध्यप्रदेश/ छत्तीसगढ़ अवधि: 10 दिन खासियत: यहाँ महाराष्ट्र जैसी ही भव्यता और उत्साह देखने को मिलता है। इंदौर, भोपाल, उज्जैन और ग्वालियर जैसे शहरों में बड़े-बड़े पंडाल सजाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी रायुपर, बिलासपुर, भिलाई, दुर्ग, जगदलपुर, अंबिकापुर आदि जगहों पर गणेश प्रतिमाओं की स्थापना होती है। अंत में विसर्जन के दिन अनंत चतुर्दशी पर झांकियां निकलती है। इंदौर की 'झांकियां' (कपड़ा मिलों की परंपरा) और अनंत चतुर्दशी पर निकलने वाले चल समारोह बेहद प्रसिद्ध हैं।
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गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में गणेश उत्सव
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गुजरात अवधि: 10 दिन खासियत: सूरत, बड़ौदा और अहमदाबाद में बप्पा की बहुत विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। यहाँ गणेशोत्सव के पंडालों में शाम की आरती के बाद पारंपरिक 'गरबा' और 'रास' का आयोजन किया जाता है, जो गुजरात की अपनी विशेष पहचान है।
राजस्थान अवधि: 3 से 10 दिन खासियत: जयपुर का प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर इस उत्सव का मुख्य केंद्र रहता है, जहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और बप्पा को हजारों किलो मोदक का भोग लगाया जाता है। घरों में भी मिट्टी के गणपति स्थापित कर पारंपरिक तरीके से पूजा होती है।
उत्तर प्रदेश अवधि: 3 से 10 दिन खासियत: पिछले कुछ वर्षों में वाराणसी, लखनऊ, कानपुर और प्रयागराज में गणेशोत्सव का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। वाराणसी में गंगा घाटों पर बप्पा की आरती की जाती है और अंतिम दिन गंगा नदी या जलकुंडों में प्रतिमाओं का विसर्जन होता है।
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पंजाब, केरल और असम में गणेश उत्सव
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पंजाब अवधि: 3 से 5 दिन खासियत: पंजाब में यह त्योहार मुख्यतः शहरों (लुधियाना, अमृतसर, जालंधर) में सार्वजनिक मंडलों और हिंदू परिवारों द्वारा मनाया जाता है। यहाँ ढोल की ताल पर भांगड़ा करते हुए बप्पा का स्वागत और विसर्जन किया जाता है।
केरल अवधि: 1 से 3 दिन खासियत: केरल में इसे 'विनायक चतुर्थी' कहा जाता है। यहाँ के प्रसिद्ध गणेश मंदिरों (जैसे तिरुवनंतपुरम का पझावंगडी गणपति मंदिर) में विशेष हाथियों का जुलूस और महापूजा आयोजित की जाती है। नारियल और चावल के आटे से बनी मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।
असम अवधि: 1 से 3 दिन खासियत: असम और उत्तर-पूर्व भारत में गणेश चतुर्थी मुख्य रूप से व्यापारी वर्ग, शैक्षणिक संस्थानों और कला प्रेमियों द्वारा मनाई जाती है। गुवाहाटी के मंदिरों और पंडालों में असमिया संस्कृति के रंग और स्थानीय सजावट देखने को मिलती है।
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बिहार, झारखंड और उत्तराखंड में गणेश उत्सव
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बिहार: अवधि: 3 से 7 दिन खासियत: पटना, गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर में बड़े-बड़े पूजा पंडाल बनाए जाते हैं। यहाँ गणेश उत्सव मुख्य रूप से सांस्कृतिक आयोजनों, मेधावी छात्रों के सम्मान और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है। विसर्जन के समय भव्य शोभायात्राएं निकाली जाती हैं।
झारखंड: अवधि: 5 से 10 दिन खासियत: रांची, जमशेदपुर (टाटानगर) और धनबाद में गणेशोत्सव का अभूतपूर्व उत्साह रहता है। जमशेदपुर का कदमा गणेश पूजा मैदान अपने दशक पुराने ऐतिहासिक और विशालकाय मेलों के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। यहाँ भव्य थीम-आधारित पंडाल सजाए जाते हैं।
उत्तराखंड अवधि: 3 से 11 दिन खासियत: उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों (जैसे देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी) में भव्य सार्वजनिक पंडाल लगाए जाते हैं। यहाँ गणेश उत्सव को पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) रूप में मनाने पर विशेष जोर दिया जाता है। उत्तरकाशी और चमोली के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय शिव-पार्वती मंदिरों में गणेश चतुर्थी पर विशेष पूजा और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
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हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में गणेश उत्सव
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हिमाचल प्रदेश अवधि: 1 से 3 दिन खासियत: हिमाचल में भगवान गणेश की पूजा 'पहाड़ी शैली' की परंपराओं के साथ की जाती है। शिमला, कांगड़ा और मंडी के प्रसिद्ध मंदिरों में विशेष आरती और भंडारे आयोजित किए जाते हैं। यहाँ लोग बप्पा को घर पर मिट्टी की छोटी मूर्ति के रूप में स्थापित करते हैं और स्थानीय पकवानों का भोग लगाते हैं।
जम्मू और कश्मीर अवधि: 1 से 5 दिन खासियत: जम्मू के 'मंदिरों के शहर' में गणेश चतुर्थी पर बहुत उत्साह रहता है। यहाँ के प्राचीन गणेश मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित समुदाय द्वारा इस दिन घर-परिवार के साथ विधि-विधान से पूजन किया जाता है। जम्मू में तवी नदी के तटों पर श्रद्धा के साथ प्रतिमा विसर्जन की शोभायात्राएं निकाली जाती हैं।
अरुणाचल प्रदेश
अवधि: 1 से 3 दिन खासियत: पूर्वोत्तर के इस राज्य में गणेश उत्सव मुख्य रूप से ईटानगर, नाहरलगुन और पासीघाट जैसे शहरी इलाकों में मनाया जाता है। यहाँ गैर-स्थानीय निवासियों, व्यापारी वर्ग और सांस्कृतिक मंडलों द्वारा बप्पा की स्थापना की जाती है। उत्सव के दौरान पूर्वोत्तर की स्थानीय कला, फूलों की सजावट और पारंपरिक संगीत का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
मेघालय, मिजोरम और नागालैंड में गणेश उत्सव
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मेघालय स्वरूप: शिलांग, तुरा और नोंगपोह जैसे शहरी इलाकों में गैर-स्थानीय निवासी, व्यापारिक समुदाय और सांस्कृतिक संगठन बप्पा की स्थापना करते हैं। खासियत: शिलांग के प्रसिद्ध 'हनुमान बख्श मंदिर' और स्थानीय सांस्कृतिक भवनों में गणेश चतुर्थी पर पूजा-अर्चना होती है। यहाँ उत्सव बेहद शांतिपूर्ण, भक्तिमय और अंतर-सांस्कृतिक सौहार्द के साथ मनाया जाता है।
मिजोरम स्वरूप: राजधानी आइजोल में रहने वाले हिंदू परिवार, केंद्रीय कर्मचारी और व्यापारी वर्ग इसे व्यक्तिगत रूप से या छोटे समूहों में मनाते हैं। खासियत: यहाँ सार्वजनिक रूप से बड़े पंडाल नहीं लगाए जाते। लोग अपने घरों या सामुदायिक हॉलों में छोटी और इको-फ्रेंडली (मिट्टी की) प्रतिमाएं स्थापित करते हैं। शाम को आरती और सात्विक भोग वितरण का आयोजन होता है।
नागालैंड स्वरूप: दीमापुर (जो नागालैंड का मुख्य व्यापारिक केंद्र है) और कोहिमा में गणेशोत्सव काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है। खासियत: दीमापुर में विभिन्न मारवाड़ी, बंगाली और अन्य हिंदू समाजों द्वारा पंडाल सजाए जाते हैं। यहाँ उत्सव के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम और महाप्रसाद (भंडारा) आयोजित किया जाता है। स्थानीय नागा समुदाय के लोग भी अक्सर इस उत्सव को देखने और बाजारों की रौनक में शामिल होने आते हैं।