फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bakrid 2026: तीन हिस्सों में क्यों बांटा जाता है कुर्बानी का गोश्त? जानें इससे जुड़े सही नियम

Wed, 27 May 2026 10:21 PM IST
Shweta Singh धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Eid-Al-Adha: ईद-उल-अजहा यानी बकरीद इस्लाम का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार माना जाता है जो त्याग, बलिदान और समर्पण का संदेश देता है। इस दिन नमाज अदा करने के बाद बकरा, भेड़, बैल या ऊंट जैसे जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है जिसमें एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए तथा तीसरा जरूरतमंद और गरीब लोगों के लिए रखा जाता है। 
विज्ञापन
1 of 4
बकरीद 2026 - फोटो : amar ujala
Bakrid 2026: ईद-उल-अजहा यानी बकरीद इस्लाम धर्म का एक बेहद पवित्र और अहम त्योहार माना जाता है। यह त्योहार त्याग, आस्था और अल्लाह के प्रति समर्पण का संदेश देता है। हर साल जुल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाए जाने वाले इस पर्व पर मुसलमान नमाज अदा करते हैं, जरूरतमंदों की मदद करते हैं और कुर्बानी की रस्म निभाते हैं। भारत में कल बकरीद मनाई जाएगी। इस दिन बकरा, भेड़, बैल, भैंस या ऊंट की कुर्बानी दी जाती है, जो हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की अल्लाह के प्रति अटूट आस्था और बलिदान की याद दिलाती है। इस्लाम में कुर्बानी केवल जानवर की बलि तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि उसके गोश्त को सही तरीके से बांटना भी जरूरी माना गया है। इसी वजह से कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने की परंपरा निभाई जाती है, जो इंसानियत, बराबरी और जरूरतमंदों की मदद का संदेश देती है।
Shul Yog 2026 Astrology: 14 जून से इन राशियों पर भारी पड़ सकता है शूल योग, करियर और धन में सावधानी जरूरी
विज्ञापन

2 of 4
एक हिस्सा कुर्बानी करने वाला अपने परिवार के लिए रखता है। - फोटो : adobe stock

तीन हिस्सों में क्यों बांटा जाता है कुर्बानी का गोश्त?
इस्लाम धर्म में कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटने की परंपरा मानी जाती है। एक हिस्सा कुर्बानी करने वाला अपने परिवार के लिए रखता है। दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को दिया जाता है। वहीं तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंद लोगों में बांटा जाता है ताकि वे भी बकरीद की खुशियों में शामिल हो सकें। इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य इंसानियत, बराबरी और जरूरतमंदों की मदद का संदेश देना है। हालांकि इस्लाम में यह भी मान्यता है कि यदि जरूरतमंद लोग न हों तो व्यक्ति पूरा गोश्त अपने पास रख सकता है। वहीं अगर कोई चाहे तो पूरा गोश्त जरूरतमंदों में भी बांट सकता है।

विज्ञापन

3 of 4
कुर्बानी के लिए जानवर का स्वस्थ और सही होना जरूरी माना जाता है। - फोटो : अमर उजाला

बकरीद पर कुर्बानी से जुड़े जरूरी नियम

  • बकरीद पर कुर्बानी से जुड़े जरूरी नियम
  • कुर्बानी के लिए जानवर का स्वस्थ और सही होना जरूरी माना जाता है।
  • इस्लाम में हर जानवर की कुर्बानी के लिए एक निश्चित उम्र तय की गई है।
  • बकरे या बकरी की उम्र कम से कम एक साल होनी चाहिए।
  • भेड़ या दुम्बा की न्यूनतम उम्र छह महीने मानी जाती है।
  • भैंस और बैल की उम्र कम से कम दो साल होना जरूरी है।
  • ऊंट की कुर्बानी के लिए उसकी उम्र पांच साल या उससे अधिक होनी चाहिए।
  • तय उम्र पूरी होने के बाद ही जानवर की कुर्बानी सही और मान्य मानी जाती है।
  • कुर्बानी का उद्देश्य केवल रस्म निभाना नहीं बल्कि त्याग, आस्था और जरूरतमंदों की मदद करना भी माना जाता है।
विज्ञापन

4 of 4
इस्लाम में कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई और इसे त्याग और समर्पण का प्रतीक माना जाने लगा। - फोटो : adobe stock

कुर्बानी की परंपरा कैसे शुरू हुई?
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार हजरत इब्राहिम अल्लाह के बेहद नेक और सच्चे बंदे थे। उनकी आस्था की परीक्षा लेने के लिए अल्लाह ने उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी। हजरत इब्राहिम अपने इकलौते बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए भी तैयार हो गए क्योंकि उन्हें अल्लाह के हुक्म पर पूरा भरोसा था। लेकिन जब वह कुर्बानी देने लगे तो अल्लाह ने उनकी आस्था और समर्पण से खुश होकर वहां एक दुम्बा भेज दिया और हजरत इस्माइल सुरक्षित बच गए। तभी से इस्लाम में कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई और इसे त्याग और समर्पण का प्रतीक माना जाने लगा।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें