ढुण्डिराज चतुर्थी
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क्यों मनाई जाती है ढुण्डिराज चतुर्थी?
ढुण्डिराज चतुर्थी का धार्मिक महत्व अत्यंत बड़ा है। यह पर्व भगवान गणेश के ढुण्डिराज स्वरूप की विशेष पूजा से जुड़ा है, जिन्हें भक्त अपनी सभी इच्छाओं और मनोरथों की पूर्ति करने वाला मानते हैं। मत्स्य पुराण में इसे मनोरथ चतुर्थी कहा गया है, और मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। गणेश जी को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माना जाता है, इसलिए उनकी आराधना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और खुशहाली आती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो नई शुरुआत कर रहे हैं – जैसे नया व्यवसाय, शिक्षा या विवाह।
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि इस व्रत से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। वाराह पुराण में इसे अविघ्नकर व्रत कहा गया है, जिसे चार महीने तक रखा जाता है और आषाढ़ में इसका उद्यापन किया जाता है। पुराणों के अनुसार, राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की सफलता के लिए, भगवान शिव ने त्रिपुरासुर से युद्ध से पहले और भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन से पहले इस व्रत का पालन किया था। इससे स्पष्ट होता है कि यह व्रत केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा भी किए जाने वाला पवित्र कर्म है।
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