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तस्वीरों में देखिए, यूं ही नहीं देवघर में लगता है भक्तों का तांता

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देवघर की यात्रा सुल्तानगंज से शुरु होती है। यहां भगवान शिव की कचहरी है जिसे अजगैबीनाथ कहते हैं। गंगा नदी के बीच बसा भोलेनाथ के इस मंदिर का संबंध उस धनुष से माना जाता है जिसे तोड़कर भगवान राम ने देवी सीता से विवाह किया था। सुल्तानगंज से जब कांवड़िया जल उठाता है तो यह माना जाता है कि अजगैबीनाथ ने भक्त की मनोकामना लिख ली है जिसे देवघर में बाबा बैजनाथ पूरा करेंगे।
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बाबा पर कांवड़ चढ़ाने के ल‌िए बोल बम का नारा लगाते कावंड़‌ियों को देख‌िए। यहां भक्तों का तांता लगे रहने का एक बड़ा कारण यह माना जाता है क‌ि द्वादश ज्योत‌िर्ल‌िंगों में यह आत्मल‌‌िंग है जो हर मनोकामना पूर्ण करता है। इसल‌िए इसे कामनाल‌िंग भी कहा जाता है।
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देवघर में बाबा बैजनाथ  के प्रांगण में तीन द‌िशाओं में तीन द्वार है। उत्तर द्वार, पूर्वी द्वार और पश्च‌िमी द्वार। इनमें उत्तरी द्वार सबसे प्रमुख है यहां एक प्राचीन कूप यानी कुआं हैं। मान्यता है क‌ि इस कूप के जल से श‌िव का अभ‌िषेक करना गंगाजल से अभ‌िषेक करने के समान फलदायी होता है। इसल‌िए जो श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगा जल नहीं ला पाते है वह इस कुएं के जल से श‌िव का अभ‌िषेक करते हैं।

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झारखंड, ब‌िहार, पश्च‌िम बंगाल, उड़ीसा से पूरे साल कांवड़‌िए बैजनाथ धाम पहुंचते हैं। ले‌क‌िन सावन और नवरात्र के द‌िनों में यहां सबसे ज्यादा कांवड़ चढाए जाते हैं। इनमें सावन सबसे प्रमुख है जब कांवड़‌ियों का तांता लगा रहता है। बाबा के मंद‌िर में प्रवेश और न‌िकासी का एक ही द्वार है। द्वार इतना छोटा है क‌ि एक बार में एक आदमी ही न‌िकल सकता है। इसल‌िए सावन के महीने में कांवड़ चढ़ाने वालों की कतार कई क‌िलोमीटर तक पहुंच जाती है।
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यह है रावण की लघुशंका से बना तालाब। इस तालाब का प्रयोग कपड़े धोने के ल‌िए क‌िया जाता है। इसमें श्रद्धालु स्नान नहीं करते हैं। इस तालाब के पास ही एक अन्य तलाब है जो श‌िव गंगा तालाब के नाम से जाना जाता है। कहते हैं रावण ने लघुशंका के बाद पव‌ित्र होने के ल‌िए इस तालाब का न‌िर्माण अपने मुक्के के प्रहार से क‌िया था। इस तालाब में स्नान करने के बाद श्रद्धालु मंद‌िर प्रांगण में प्रवेश करते हैं।
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देवघर में बाबा भोले के अलावा यहां म‌िलने वाले पेड़े के ल‌िए भी मशहूर है ज‌िसे भक्त प्रसाद रुप में ले जाते हैं। वैसे श्रद्धालु पेड़े के ल‌िए यहां नहीं आते बल्क‌ि उस श‌िवल‌िंग के दर्शन के ल‌िए आते हैंज‌िसके ऊपर अष्टदल कमल के बीच में लगे चंद्रकांत मण‌ि से जल टपकता रहता है।
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रावण द्वारा स्‍थाप‌ित और पूज‌ित यह ज्योत‌िर्ल‌िंग मनोकामना पूरी करने वाला माना जाता है। ऐसी धारणा है क‌ि बाबा बैजू यानी बैजनाथ को कांवड़ चढ़ाने से मन की मुराद पूरी होती है। इस धारणा के कारण पूरे साल बाबा बैजनाथ को कांवड़ चढ़ता रहता है। यह है देवघर का ज्योत‌िर्ल‌िंग जो सालों से भक्तों के स्पर्श से घ‌िसकर भग के बराबर आ गया है।

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यह है पश्‍च‌िम बंगाल का तारापीठ ज‌िसका संबंध देवघर से है। तारापीठ में देवी सती के नेत्र ग‌िरे थे और देवघर में देवी सती का अंत‌िम संस्कार हुआ था, ऐसी मान्यता है। इसल‌िए देवघर को भी शक्त‌िपीठ के रुप में भी जाना जाता है। यानी यहां श‌िव के साथ शक्त‌ि भी मौजूद हैं ऐसा माना जाता है। इसल‌िए भी यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।
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यह है वासुकीनाथ। देवघर की यात्रा का अंत‌िम पड़ाव इसे  माना जाता है। ब‌िना वासुकीनाथ के दर्शन के ब‌िना यह यात्रा अधूरी मानी जाती है। वासुकीनाथ की सबसे बड़ी बात यह है क‌ि यह खंड‌ित श‌‌िवल‌िंग हैं जो चांदी से जुड़ा हुआ है। इसके पीछे एक भक्त का शाप माना जाता है। कहते हैं वासुकीनाथ में आकर भक्तों को उनकी यात्रा का फल म‌िलता है।
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