रामायण में उल्लेख है कि भगवान राम ने राज्याभिषेक के बाद एक धोबी के द्वारा देवी सीता के चरित्र पर उठाए गए सवाल के कारण देवी सीता को अपने से अलग कर दिया था और देवी सीता को वन में रहना पड़ा।
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यहां भगवान राम से अलग होने के बाद देवी सीता ने दिया था लव कुश को जन्म
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कहते हैं जिस समय भगवान राम ने देवी सीता को वन में भेजा उस दौरान वह गर्भवती थी। और वन में देवी को अपने दोनों पुत्रों लव और कुश को जन्म देना पड़ा था। जहां देवी सीता ने अपने पुत्रों को जन्म दिया था वह स्थान उत्तराखंड के नैनीताल से करीब 62 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
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यह स्थान आज देवी सीता के कारण सीतावनी के नाम से जाना जाता है। यहां देवी का एक मंदिर है जहां देवी सीता अपनी गोद में दोनों पुत्रों को लिए हुए है। मंदिर के पुजारी शिव गिरी गोस्वामी बताते हैं कि त्रेतायुग में जब भगवान राम ने सीता का त्याग कर दिया तो यहीं बाल्मिकी आश्रम में देवी सीता ने निवास किया था।
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सीतावनी मंदिर की दीवार पर टंगी इस तस्वीर को देखिए। इनमें बताया गया है कि जब लक्ष्मण जी यहां देवी सीता को छोड़कर चले गए थे तब रोती हुई देवी सीता को बाल्मिकी आश्रम की स्त्रियों ने संभाला था। यह तस्वीर राम सीता के दूसरे विछोह को दर्शाती है।
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पुजारी शिव गिरी के अनुसार यहां पर पास में ही भगवान राम के नाम से रामपुर नामक स्थान है और पास ही लक्ष्मणपुरा है जहां पर बालक लव कुश ने भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया था।
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सीतावनी के बारे में पुजारी का यह भी कहना है कि यह स्थान दो पहाड़ी के बीच बसा है और नीचे गहरी खाई। कहते हैं यहीं देवी सीता की पुकार पर धरती दो भागों में बांट गयी थी और देवी सीता धरती माता की गोद में समा गई थी। तस्वीर में देखिए खाई में मौजूद विशाल कुंड।
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सीतावनी में मौजूद इन तीन धाराओं को देखिए इनका नाम है राम धारा, लक्ष्मण धारा और सीता धारा। इन धाराओं की खूबी है कि यहां का पानी गर्मी में ठंडा, सर्दी में गर्म और तो और बरसात में भी इसका पानी मैला नहीं होता है। पुजारी कहते हैं कि ये धाराएं यहीं की पवित्रता की पहचान हैं।
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अगर आप इस स्थान पर जाना चाहते हैं आपको जिम कार्बोट नेशनल पार्क जाना होगा क्योंकि यह स्थान आज इसी पार्क के अंतर्गत आता है। यह स्थान बाघों का संरक्षित घर है इसलिए अक्सर यहां बाघ दिख जाते हैं। अगर संयोग से बाघ नहीं दिखे तो दूसरे जंगली जानवर जरुर दिख जाएंगे।