आचार्य चाणक्य
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पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमाप: सुभोषितम्।
मूढै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञां विधीयते।।
आचार्य चाणक्य इस श्लोंक के माध्यम से कहते हैं कि अन्न, जल तथा सुंदर शब्द, पृथ्वी पर मौजूद तीन असली रत्न हैं। पत्थर के टुकड़ों (हीरा, जवाहरात) को रत्न का नाम देने वाले मूर्ख हैं।
यहां पर आचार्य चाणक्य के कहने का तात्पर्य यह है कि हीरे जवाहरात आदि तो केवल पत्थर के टुकड़े हैं, जीवन के असली रत्न तो अन्न जल और मधुर वाणी है। इसलिए चाणक्य का कहना है कि इन असली रत्नों के मूल्यों को न समझकर हीरे जवाहरात को रत्न कहना मूर्खता है।