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11 नवंबर को मनाई जाएगी भाई दूज, जानें तिलक का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पौराणिक कथा

Fri, 09 Oct 2026 11:56 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पर्व भाई दूज इस साल 11 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन बहन भाई को तिलक कर उसकी सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना करती है। जानें भाई दूज की तिथि, तिलक मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व।

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भाई दूज 2026 - फोटो : amar ujala

Bhai Dooj 2026: दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव का समापन भाई दूज के पर्व के साथ होता है। यह त्योहार भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, स्नेह और विश्वास को मजबूत करने का अवसर माना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई को तिलक लगाकर उसके सुखी, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना करती है। बदले में भाई अपनी बहन के प्रति स्नेह व्यक्त करते हुए उसे उपहार देता है। धार्मिक दृष्टि से भाई दूज को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व का संबंध भगवान यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी पौराणिक कथा से माना जाता है। आइए जानते हैं साल 2026 में भाई दूज कब मनाई जाएगी, तिलक का शुभ समय क्या रहेगा और इस दिन पूजा की विधि क्या है।

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भाई दूज कब है?

भाई दूज कब है?
पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज मनाई जाती है। वर्ष 2026 में भाई दूज का पर्व बुधवार, 11 नवंबर को मनाया जाएगा। द्वितीया तिथि 10 नवंबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे शुरू होगी और 11 नवंबर को दोपहर 3:53 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर भाई दूज का पर्व 11 नवंबर को मनाया जाएगा।

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भाई दूज तिलक मुहूर्त

भाई दूज तिलक मुहूर्त
भाई दूज पर भाई को तिलक लगाने के लिए दोपहर का समय विशेष माना जाता है। 11 नवंबर को तिलक का अपराह्न मुहूर्त लगभग दोपहर 1:10 बजे से 3:20 बजे तक रहेगा। हालांकि, तिलक के समय में स्थान के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग में दिए गए मुहूर्त को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।

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भाई दूज का क्या धार्मिक महत्व है?

भाई दूज का क्या धार्मिक महत्व है?
भाई दूज का पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और एक-दूसरे के प्रति मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन बहन अपने भाई की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती है। इस पर्व को यम द्वितीया भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे थे। यमुना ने उनका आदर-सत्कार किया और प्रेमपूर्वक भोजन कराया। बहन के स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया। इसी कथा के कारण भाई दूज के दिन बहन द्वारा भाई का तिलक करने की परंपरा को विशेष महत्व मिला।

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तिलक के बाद अक्षत अर्पित किए जाते हैं और भाई की आरती उतारी जाती है।

भाई दूज पूजा विधि

  • भाई दूज की पूजा में रीति-रिवाज परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
  • सामान्य रूप से इस दिन बहन स्नान करके साफ कपड़े पहनती है और तिलक की थाली तैयार करती है।
  • इसके बाद शुभ समय में भाई को आसन पर बैठाकर उसके माथे पर रोली या कुमकुम से तिलक लगाया जाता है।
  • तिलक के बाद अक्षत अर्पित किए जाते हैं और भाई की आरती उतारी जाती है।
  • बहन अपने भाई के अच्छे स्वास्थ्य, सुख और सफलता के लिए प्रार्थना करती है।
  • आरती के बाद भाई को मिठाई खिलाई जाती है।
  • भाई भी अपनी बहन को उपहार देकर उसके सुखी जीवन की कामना करता है।
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भाई दूज की तिलक थाली में क्या रखें? - फोटो : adobe stock

भाई दूज की तिलक थाली में क्या रखें?
भाई दूज के लिए पूजा की थाली में अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार सामग्री रखी जा सकती है। सामान्य तौर पर इसमें ये चीजें शामिल होती हैं:

  • रोली या कुमकुम
  • अक्षत
  • फूल
  • दीपक
  • मिठाई
  • फल
  • पूजा के लिए स्वच्छ जल
थाली को साफ करके व्यवस्थित रूप से सजाना और पूजा के दौरान श्रद्धा का भाव रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।
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भाई दूज पर क्या करना शुभ माना जाता है?

भाई दूज पर क्या करना शुभ माना जाता है?
भाई दूज केवल तिलक की रस्म तक सीमित पर्व नहीं है। यह भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने और एक-दूसरे के प्रति सम्मान जताने का अवसर भी है। इस दिन भाई-बहन एक-दूसरे के साथ समय बिताएं, पुराने मतभेदों को पीछे छोड़ें और रिश्ते में प्रेम व अपनापन बढ़ाने का प्रयास करें। अगर भाई या बहन किसी दूसरे शहर में रहते हैं, तो फोन या वीडियो कॉल के जरिए भी एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी जा सकती हैं।

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भाई दूज के दिन पूजा और तिलक की रस्म को शांत मन से करना चाहिए।

भाई दूज के दिन किन बातों का ध्यान रखें? 

  • भाई दूज के दिन पूजा और तिलक की रस्म को शांत मन से करना चाहिए।
  • आपसी विवाद, कटु वचन और अनावश्यक तनाव से बचना बेहतर माना जाता है।
  • पूजा की सामग्री साफ और शुद्ध रखें तथा तिलक के लिए अपने परिवार में चली आ रही परंपरा का पालन करें।
  • किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को केवल दिखावे के लिए करने के बजाय श्रद्धा और सकारात्मक भाव से करना अधिक महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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