1- इस धाम के बारे में कहावत है कि-"जो जाए बद्री,वो न आए ओदरी"यानि जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे माता के गर्भ में दोबारा नहीं आना पड़ता,प्राणी जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट जाता है।
2- भगवान नारायण के वास के रूप में जाना जाने वाला बद्रीनाथ धाम आदि शंकराचार्य की कर्म स्थली रहा है। यह भी माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं सदी में मंदिर का निर्माण करवाया था।
3- बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर(शालिग्राम)की प्रतिमा है जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में सुशोभित है। मंदिर के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते है जिन्हें रावल कहा जाता है। यह जब तक रावल के पद पर रहते है इन्हें ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना होता है।
4- मंदिर परिसर में अलग-अलग देवी-देवताओं की 15 मूर्तियां विराजमान हैं। अक्षय तृतीया पर जब बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं उस समय भी मंदिर में एक दीपक जलता रहता है,इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्त्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाज़े के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं।