मान्यता है कि कुल 12 कुंभ होते हैं, जिनमें से चार पृथ्वी पर होते हैं। वहीं अन्य आठ कुंभ का आयोजन देवलोक में होता है, जिसका लाभ केवल देवगणों को ही मिलता है।
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Maha Kumbh 2025: पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त करने का प्रयास किया। जब अमृत कलश की प्राप्ति हुई, तो इसे लेकर देवताओं और दानवों के बीच बारह दिनों तक भीषण युद्ध हुआ। देवताओं का एक दिन मानव के एक वर्ष के बराबर माना जाता है, इसलिए यह युद्ध पृथ्वी के समय के अनुसार बारह वर्षों तक चला। कहते हैं कि युद्ध के दौरान अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी के चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक पर गिरीं। इसलिए इन चार स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। मान्यता है कि कुल 12 कुंभ होते हैं, जिनमें से चार पृथ्वी पर होते हैं। वहीं अन्य आठ कुंभ का आयोजन देवलोक में होता है, जिसका लाभ केवल देवगणों को ही मिलता है।
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कुंभ मेला की गणना कैसे होती है?
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कुंभ मेला की गणना कैसे होती है?
कुंभ मेला के आयोजन का समय और स्थान तय करने के लिए ज्योतिषीय गणना की जाती है, जिसमें बृहस्पति ग्रह (गुरु) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। बृहस्पति एक राशि में एक वर्ष तक रहते हैं यानी बारह राशियों में एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 12 वर्ष लगते हैं।
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महाकुंभ की गणना
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जब बृहस्पति वृषभ राशि और सूर्य मकर राशि में होते हैं, तब कुंभ मेला प्रयागराज में आयोजित होता है।
जब बृहस्पति कुंभ राशि और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तब कुंभ मेला हरिद्वार में आयोजित होता है।
जब बृहस्पति सिंह राशि और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तब कुंभ मेला उज्जैन में आयोजित होता है।
जब बृहस्पति सिंह राशि और सूर्य भी सिंह राशि में होते हैं, तब कुंभ मेला नासिक में आयोजित होता है।
महाकुंभ की गणना
महाकुंभ का आयोजन हर 144 वर्षों में प्रयागराज में होता है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि देवताओं का बारहवां वर्ष पृथ्वी के 144 वर्षों के बराबर होता है।
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ग्रहों की स्थिति और कुंभ
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ग्रहों की स्थिति और कुंभ
पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ ज्योतिषीय आधार पर कुंभ का आयोजन बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश और सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से जुड़ा हुआ है। ग्रहों की बदलती स्थिति ही कुंभ आयोजन का आधार बनती है। आध्यात्मिक दृष्टि से, अर्धकुंभ के समय ग्रहों की स्थिति ध्यान और साधना के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है।