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इकलौते मां कूष्मांडा के मंदिर में दूर होते हैं नेत्र विकार

Tue, 27 Sep 2016 07:38 PM IST
अवध दीक्षित, कानपुर
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घाटमपुर स्थित मां कूष्मांडा - फोटो : अमर उजाला
नवरात्र की चौथी देवी माता कूष्मांडा का एकमात्र मंदिर पूरे प्रदेश में सिर्फ कानपुर के घाटमपुर कसबे में है। मान्यता है कि मां की पूजा-अर्चना करने के बाद मूर्ति से नीर लेकर आंखों पर लगाने से दिव्य नेत्र ज्योति मिलती है जिससे सारे नेत्र विकार दूर हो जाते हैं। नवरात्र पर्व पर मंदिर में मेला लगता है। चतुर्थी तिथि पर हजारों भक्त माता के दर्शन करने आते हैं। मनोकामना पूरी होने पर मैया को चुनरी, ध्वजा, नारियल और घंटा चढ़ाने के साथ ही भीगे चने अर्पण करते हैं।
भदरस गांव निवासी कवि उम्मेदराय खरे की सन् 1783 में फारसी में लिखी गई पांडुलिपि (ऐश आफ्जा) में माता कूष्मांडा और पड़ोसी गांव भदरस की माता भद्रकाली के स्वरूपों का वर्णन किया है। कानपुर इतिहास के लेखक लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और नारायण प्रसाद अरोड़ा ने घाटमपुर की कूष्मांडा देवी का उल्लेख किया है। इतिहासकारों के मुताबिक कभी यहां घना जंगल था। कुड़हा नामक चरवाहा वहां गायें चराने जाता था। गाय झाड़ी के पास खड़ी होकर अपना दूध गिरा देती थी। चरवाहे ने इसकी निगरानी की उसे रात में स्वप्न में माता ने दर्शन दिए। झाड़ी के नीचे खोदाई करने पर मां कूष्मांडा प्रकट हुईं, उसी स्थान पर स्थापित करवाया गया। चरवाहे कुड़हा के नाम पर मां कूष्मांडा का एक नाम कुड़हा देवी भी है। स्थानीय लोग इसी नाम से पुकारते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक कूष्मांडा देवी के वर्तमान मंदिर का निर्माण 1890 में कसबे के चंदीदीन भुर्जी ने कराया था। सितंबर 1988 से मंदिर में मां कूष्मांडा की अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित हो रही है।
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मां कूष्मांडा देवी का मंदिर

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मां कूष्मांडा देवी का मंदिर - फोटो : अमर उजाला
कूष्मांडा देवी के मंदिर में मूर्ति की पूजा वहां के माली ही करते हैं। नवरात्र, मेला और अन्य प्रमुख पर्वों पर मेला परिसर की साफ-सफाई, रोशनी और अन्य व्यवस्थाएं नगरपालिका प्रशासन करवाता है। मेला और पर्वों में मंदिर परिसर में सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया जाता है।
छोटकऊ सैनी, चुन्नीलाल,मुन्नी देवी और जयदेवी सैनी ने बताया कि मंदिर में व्यवस्था के लिए मालियों की समिति है। आने वाले चढ़ावे से आरती-प्रसाद की व्यवस्था करने के बाद बचे धन को पारिश्रमिक के रूप में बांट लेते हैं। भक्त ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानी, सुरेश सोनी, रामचंद्र गुप्ता और रामजी ओमर ने बताया कि माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद हमेशा पूरी होती है।
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मंदिर परिसर में बने तालाबों में भक्त करते स्नान

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मंदिर परिसर में बने तालाबों में भक्त करते स्नान - फोटो : अमर उजाला
कूष्मांडा देवी मंदिर परिसर में दो तालाब बने हैं। भक्त तालाब में स्नान करने के बाद दूसरे कुंड से जल लेकर माता को चढ़ाते हैं। वर्षों से दोनों तालाबों में पानी नहीं रहने से भक्तों को परेशानी होती है। 
नवरात्र की चतुर्थी पर माता कूष्मांडा देवी के मंदिर परिसर में दीपदान महोत्सव काफी दर्शनीय होता है। शाम का धुंधलका घिरने से पूर्व ही मंदिर परिसर असंख्य दीपों की रोशनी से जगमगा जाता है। दीपदान करने के लिए आसपास के गांवों के हजारों लोग आते हैं।  
ऐसे पहुंचें मां के दरबार
चतुर्थ देवी कूष्मांडा सिद्धपीठ पहुंचने के लिए बस के जरिए और कानपुर-बांदा रेल लाइन से घाटमपुर स्टेशन उतरकर मंदिर पहुंचा जा सकता है। मंदिर कानपुर-सागर राजमार्ग के किनारे स्थित है। वहां पहुंचने के लिए हर समय साधन मिलते हैं। कानपुर के नौबस्ता बाईपास से मंदिर मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर है।
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