आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा गया है। पुराणों में बताया गया है कि इस एकादशी के पुण्य से मनुष्य को मृत्यु के बाद भूत-प्रेत बनकर भटकना नहीं पड़ता है।
इतना ही नहीं जो व्यक्ति इस व्रत का नियम पूर्वक पालन करता है उसे एक साथ 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन करवाने का पुण्य मिल जाता है। माना जाता है कि इस पुण्य से मनुष्य स्वर्ग में जाने का अधिकारी बन जाता है। इस व्रत में पीपल के वृक्ष की पूजा का भी बड़ा महत्व है।
इस व्रत के विषय में पुराणों में एक कामाशक्त यक्ष की कथा है जो काम भाव में लीन होकर ऐसी गलती कर बैठा कि उसे कुष्ठ रोग हो गया।
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योगिनी एकादशी की कथा
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laxmi kuber
स्वर्ग में अलकापुरी नगरी है। यहां के राजा कुबेर हैं। ‘हेममाली’ नाम का एक यक्ष कुबेर की सेवा में था। इसका काम प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा के लिए फूल लाकर देना था। एक बार कुबेर भगवान शिव की पूजा में बैठे थे लेकिन दोपहर बीत जाने के बाद भी हेममाली फूल लेकर नहीं आया। इससे कुबेर नाराज हुए और अपने सेवकों से पूछा कि हेममाली फूल लेकर क्यों नहीं आया है।
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सेवकों ने कहा कि वह कामाशक्त होकर पत्नी संग विहार कर रहा है
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भगवान विष्णु
इस पर सेवकों ने कहा कि वह कामाशक्त होकर पत्नी के संग विहार कर रहा है। इससे कुबेर कुपित हो उठे और हेममाली को श्राप दिया कि तुम मृत्यु लोक में चले जाओ। शिव की अवहेलना करने के कारण तुम्हें कुष्ठ रोग हो जाए। हेममाली तुरंत स्वर्ग से पृथ्वी लोक पर आ गया। कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए हेममाली एक दिन ऋषि मार्कण्डेय जी के पास पहुंचा। ऋषि ने हेममाली को योगिनी एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। इस व्रत से हेममाली का कुष्ठ रोग समाप्त हो गया और पाप से मुक्त होकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर लिया।
इस एकादशी के दिन शरीर पर मिट्टी या तिल लगाकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद एक घड़े में जल भरकर उसके ऊपर भगवान विष्णु की प्रतिमा बैठानी चाहिए। घी का दीपक जलाकर भगवान की पूजा करनी चाहिए। एकादशी तिथि के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है। दिन भर सात्विक दिनचर्या बनाए। जितना अधिक संभव हो 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करना चाहिए।