भारतीय संस्कृति में महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए तमाम तरह के व्रत रखती हैं। ऐसे में वट सावित्री व्रत का बहुत ज्यादा महत्व होता है। महिलाएं इस व्रत को सौभाग्य प्राप्ति के लिए करती हैं। इस व्रत को ज्येष्ठ महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है। इस साल यह व्रत 3 जून को मनाया जाएगा। इस व्रत के पीछे सावित्री और सत्यवान की कथा जुड़ी हुई है। सावित्री अपने पति सत्यवान का प्राण यमराज से ले आई थी। जिसके बाद से महिलाएं इस व्रत को करना शुरू कर दी थीं। तो आइए जानते हैं इस व्रत कि पूजा विधि के बारे में...
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वट सावित्री का महत्व
- फोटो : social media
वट सावित्री पूजा विधि
-सुबह स्नान के बाद बिना कुछ खाए-पिए व्रत करने का संकल्प लें। महिलाएं इस व्रत की शुरुआत पूरे श्रृगांर करने के बाद शुरू करें। इस दिन पीला सिंदूर लगाना शुभ माना जाता है।
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वट सावित्री का महत्व
- वट वृक्ष के नीचे यानी (बरगद के पेड़) सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति रखें। बरगद के पेड़ में जल डालकर उसमें पुष्प, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं।
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वट सावित्री का महत्व
वट यानी (बरगद) के पेड़ में रक्षा सूत्र बांध आशीर्वाद मांगा जाता है। कम से कम सात बार परिक्रमा करेंं। इसके बाद हाथ में काला चना लेकर इस व्रत का कथा सुनें। कथा सुनने के बाद पंडित जी को दान देना न भूलें। दान में आप वस्त्र,पैसे और चना दें।
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वट सावित्री का महत्व
अगले दिन व्रत को तोड़ने से पहले बरगद के वृक्ष का कोपल खाकर उपवास समाप्त करें। इसके साथ ही सौभाग्यवती महिला को श्रृंगार का सामान जरूर दान में दें।