फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बैसाखी 2018: खालसा पंथ की स्थापना और फसल के तैयार होने की खुशी का पर्व है बैसाखी

Sat, 14 Apr 2018 07:40 AM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 5
सवाल है कि बैसाखी का त्योहार इतना निश्चित क्यों है? हर साल 13 अप्रैल (ज्यादातर) को और कभी-कभी 14 अप्रैल को होता है। अधिकांश पर्व-त्योहार मौसम, मौसमी फसल और उनसे जुड़ी गतिविधियों से ही संबंधित हैं। भारत में महीनों के नाम नक्षत्रों पर रखे गए हैं। बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। विशाखा नक्षत्र पूर्णिमा में होने के कारण इस माह को वैशाख कहते हैं। इस प्रकार वैशाख मास के पहले दिन को बैसाखी कहा गया है और पर्व के रूप में माना गया है। 
विज्ञापन

2 of 5
बैसाखी अप्रैल में तब मनाया जाता है, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। इसी समय सूर्य की किरणें गर्मी का आगाज करती हैं। इन किरणों के प्रभाव से जहां रबी की फसल पक जाती है, वहीं खरीफ की फसल का मौसम शुरू हो जाता है। इस पर्व की धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता भी काफी है। लोग देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां बैसाखी के रूप में उल्लास का रंग दिखता है, तो उत्तर-पूर्वी भारत के असम आदि राज्यों में बिहू पर्व मनाया जाता है।
विज्ञापन

3 of 5
लेकिन जिस कारण बैसाखी को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है वह खालसा पंथ की स्थापना है। खालसा शब्द खालिस से बना है, जिसका अर्थ शुद्ध, पावन या पवित्र होता है। गुरु गोबिंद सिंह ने सन 1699 में इसी दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी थी। इसलिए भी बैसाखी पर्व सूर्य की तिथि के अनुसार मनाया जाने लगा। पंथ की स्थापना का उद्देश्य समाज को शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके जीवन को श्रेष्ठ बनाना था।

सिख पंथ के प्रथम गुरु नानकदेव ने भी वैशाख माह की आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से काफी प्रशंसा की है, इसलिए पंजाब और हरियाणा सहित कई क्षेत्रों में बैसाखी मनाने के आध्यात्मिक सहित तमाम अन्य कारण भी हैं। गुरु गोबिंद सिंह ने गुरु के बलिदान के बाद, धर्म की रक्षा के लिए बैसाखी के दिन अलग-अलग जातियों, धर्मों और क्षेत्रों से चुनकर पंच प्यारों को अमृत छकाया। 

4 of 5
गुरु गोबिंद सिंह का शुरू का नाम गोविन्द राय था। उनका जन्म 1666 में पौष सुदी सप्तमी को पटना शहर में हुआ। उनके जन्म के समय गुरु तेग बहादुर असम में थे। बाद में पंजाब लौटने पर उन्होंने परिवार को पंजाब ही बुला लिया। यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। गुरु तेग बहादुर जिस समय शहीद हुए थे, उस समय गोबिंद सिंह पंद्रह वर्ष के थे। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया। वे इस बात को जानते थे कि लोगों को शासकों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए सैन्य शक्ति से ज्यादा लोगों का अवसाद दूर करना और उनमें नैतिक बल भरना जरूरी है।

इस उद्देश्य के लिए उन्होंने सेना को धार्मिक रूप देने का निश्चय किया। गुरु गोबिंद सिंह ने दृढ़ता और बुद्धिमता से यह काम किया।लेकिन, जिस प्रवर्तन के लिए बैसाखी तमाम पर्व-त्योहारों का सिरमौर बना, वह गुरु गोबिंद सिंह द्वारा स्वधर्म और स्वराष्ट्र की रक्षा के लिए सन्त और सिपाही के समन्वय की अनूठी कल्पना है। शिष्यों के एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में तलवार पकड़ाकर मानवता की रक्षा के प्रयोग का श्रेय गुरु गोबिंद सिंह को ही है। 
 
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
वहीं, हिंदू संप्रदाय के लोग इसे नववर्ष के रूप में भी मनाते हैं। इस दिन स्नान, भोग आदि लगाकर पूजा की जाती है। कतिपय पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगीरथ कठोर तप के बाद देवी गंगा को धरती पर उतारने में इसी दिन कामयाब हुए थे। इसलिए लोग पारंपरिक रूप से गंगा स्नान को भी पवित्र मानते हैं व देवी गंगा की स्तुति करते हैं। ज्योतिष की दृष्टि से भी बैसाखी को शुभ और मंगलकारी माना गया है। इस दिन सौर वैशाख महीने की शुरुआत भी मानी जाती है, वहीं सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें