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Pradosh Vrat Katha: आज शनी प्रदोष व्रत पर शाम की पूजा में करें इस कथा का पाठ, दूर होंगे सारे संकट

Sat, 27 Jun 2026 11:25 AM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Shani Pradosh Vrat Katha: शनि प्रदोष व्रत के दिन इसकी कथा का पाठ करना अत्यंत आवश्यक माना गया है, क्योंकि इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
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शनि प्रदोष व्रत कथा - फोटो : Amar Ujala
Shani Pradosh Vrat Katha:  शनिवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार, जिन व्यक्तियों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि से संबंधित कोई दोष होता है, उनके लिए इस व्रत का पालन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। यह व्रत शनि के अशुभ प्रभावों को कम करता है और जीवन में संतुलन एवं स्थिरता लाने में सहायक होता है। शनि प्रदोष व्रत के दिन इसकी कथा का पाठ करना अत्यंत आवश्यक माना गया है, क्योंकि इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
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शनि प्रदोष व्रत कथा - फोटो : freepik
शनि प्रदोष व्रत कथा
पुराने समय की बात है, एक गरीब ब्राह्मण परिवार अत्यंत कष्टों के बीच अपना जीवन बिता रहा था। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि ब्राह्मण की पत्नी को अपने दोनों पुत्रों के साथ भिक्षा मांगकर गुजारा करना पड़ता था। एक दिन भटकते-भटकते वे ऋषि शाण्डिल्य के आश्रम पहुंच गए। उनकी दयनीय स्थिति देखकर ऋषि का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने पूछा, “हे देवी, तुम इतनी दुखी और व्याकुल क्यों हो?”

ब्राह्मण की पत्नी ने विनम्रता से उत्तर दिया, “हे मुनिवर, हमारा जीवन अत्यंत कठिनाइयों में बीत रहा है। हम गरीबी से जूझ रहे हैं। मेरा बड़ा पुत्र वास्तव में एक राजकुमार है, जिसका नाम धर्म है। दुर्भाग्यवश, उसके पिता का राज्य उससे छिन गया और तब से वह मेरे साथ ही रह रहा है। मेरा छोटा पुत्र शुचिव्रत बहुत ही सरल और धर्मपरायण है। कृपया हमें ऐसा उपाय बताइए जिससे हमारे जीवन में सुख और समृद्धि आ सके।”
 
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शनि प्रदोष व्रत कथा - फोटो : adobe stock
ऋषि शाण्डिल्य ने उनकी पीड़ा को समझते हुए कहा, “तुम शनि प्रदोष व्रत को विधि-विधान और पूर्ण श्रद्धा के साथ करो। यह व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, विशेषकर जब यह शनिवार को आता है। इसे नियम और संयम से करने पर सभी दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख, संपत्ति और सम्मान की प्राप्ति होती है।”

ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए व्रत आरंभ कर दिया। कुछ ही समय में उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगे। एक दिन उनका छोटा पुत्र शुचिव्रत खेलते हुए गांव के पास एक पुराने कुएं के पास पहुंचा, जहां उसे सोने के सिक्कों से भरा एक कलश मिला। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर गई।
 

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शनि प्रदोष व्रत कथा - फोटो : adobe stock
उधर बड़े पुत्र धर्म की मुलाकात एक अत्यंत सुंदर कन्या से हुई, जो एक गंधर्व की पुत्री थी। उसका नाम अंशुमति था और उसके पिता विद्रविक नामक प्रसिद्ध गंधर्व थे। धर्म और अंशुमति एक-दूसरे को देखते ही आकर्षित हो गए। अंशुमति ने बताया कि वह भी भगवान शिव की उपासक है और प्रदोष व्रत का पालन करती है।

कुछ समय बाद भगवान शिव ने अंशुमति के पिता को स्वप्न में आदेश दिया कि वे अपनी पुत्री का विवाह धर्म से करें, क्योंकि वह योग्य, धर्मनिष्ठ और शिवभक्त है। गंधर्व ने भगवान की आज्ञा का पालन किया और बड़े धूमधाम से दोनों का विवाह संपन्न कराया। विवाह के पश्चात धर्म को उसका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया और उसका जीवन सुख, वैभव और यश से भर गया।
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शनि प्रदोष व्रत कथा - फोटो : adobe stock
इस प्रकार शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से एक निर्धन परिवार का भाग्य बदल गया। इस व्रत का महत्व केवल आर्थिक परेशानियों को दूर करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में खोया हुआ सम्मान, प्रतिष्ठा, वैवाहिक सुख और समृद्धि भी प्रदान करता है।
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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