दीपावली के अवसर पर देवी लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की पूजा के बिना देवी लक्ष्मी की पूजा का फल नहीं मिलता है और दीपावली पर देवी लक्ष्मी को मनाने का सिलसिला कार्तिक कृष्ण एकादशी के दिन से आरंभ हो जाता है। इसलिए इस एकादशी का शास्त्रों में बड़ा महत्व बताया गया है। इस एकादशी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि चतुर्मास की यह अंतिम एकदशी है। भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी जिनका एक नाम रमा भी हैं उन्हें यह एकादशी अत्यंत प्रिय है इसलिए इस एकादशी का नाम रमा एकादशी है। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी के पुण्य से सुख ऐश्वर्य को प्राप्त कर मनुष्य उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करता है। इस वर्ष यह एकादशी 26 अक्तूबर बुधवार के दिन है।
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दीपावली से पहले रमा एकादशी, इस तरह लोक परलोक सुधारें आज
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विष्णु
पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति इस एकादशी के दिन लक्ष्मी नारायण का ध्यान करते हुए यह व्रत रखते है वह पूर्वजन्म के पापों से मुक्त होकर उत्तम लोक में जाने के अधिकारी बन जाते हैं। इस व्रत में तुलसी की पूजा एवं भगवान विष्णु को तुलसी पत्ता अर्पित करने का बड़ा महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति यह व्रत नहीं भी रखते हैं वह इस एकादशी के दिन अगर लक्ष्मी नारायण की पूजा करें और उन्हें तुलसी पत्ता अर्पित करें तो उन्हें भी बड़ा पुण्य प्राप्त होता है।
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दीपावली से पहले रमा एकादशी, इस तरह लोक परलोक सुधारें आज
रमा एकादशी की कथा में उल्लेख है कि राजकुमार चन्द्रसेन अपने ससुराल आए यहां हर कोई एकादशी का व्रत करता था। ससुराल वालों के कहने पर इन्होंने यह व्रत तो रख लिया लेकिन भूख प्यास सहन नहीं होने के कारण इनकी मृत्यु हो गई। लेकिन एकादशी के पुण्य से इन्हें अप्सराओं के साथ सुंदर नगरी में रहने का अवसर मिला। लेकिन पति की मृत्यु से दुखी होकर इनकी पत्नी भगवान विष्णु की उपासन की उपासना में लीन रहने लगी।
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भगवान विष्णु
एक दिन चन्द्रसेन की पत्नी चंद्रभागा को इस बात की जानकारी मिली की उनके पति को रमा एकादशी के पुण्य से उत्तम नगरी में स्थान मिला है लेकिन पुण्य की कमी से उन्हें जल्दी ही इस नगरी से जाना होगा। चंद्रभागा ने ऋषि वामदेव की सहायता से अपने पुण्य का कुछ भाग अपने पति को दे दिया और स्वयं भी पति के पास पहुंच गई।
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भगवान विष्णु
इस एकादशी व्रत को जो लोग रखते हैं उन्हें प्रातः लक्ष्मी नारायण की पूजा करनी चाहिए और भगवान विष्णु को तुलसी एवं देवी लक्ष्मी की लाल पुष्प से पूजा करनी चाहिए। अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मण को भोजन करवाकर स्वयं भोजन करना चाहिए।