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Papmochani ekadashi 2020: कब है पापमोचनी एकादशी? जानें पूजा विधि, शुुभ मुहूर्त और व्रत कथा

Mon, 16 Mar 2020 03:14 PM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
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हिंदू पंचाग के अनुसार साल में कुल 24 एकादशी होती है। हर माह में 2 एकादशी पड़ती हैं, एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का बहुत अधिक महत्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। अगली स्लाइड्स में जानते हैं कब है पाप मोचनी एकादशी, पूजा विधि, शुुभ मुहूर्त और व्रत कथा....
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कब है पाप मोचनी एकादशी
  • 19 मार्च, गुरुवार

 
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पूजा विधि
  • एकादशी से एक दिन पहले सात्विक भोजन करें। 
  • सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें। 
  • स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें और विधि-विधान से विष्णु भगवान की पूजा करें।
  • मोह-माया से दूर रहकर इस दिन भजन-र्कीतन करने चाहिए। 
  • दिनभर भगवान विष्णु का घ्यान करें।
  • पूरा दिन व्रत रखने के बाद शाम को भगवान विष्णु की पूजा करें और अपनी इच्छानुसार उन्हें भोग लगाएं। 
  • एकादशी के दिन विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

 

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मंत्र जाप
  • ओम विष्णवे नम:
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शुुभ मुहूर्त

पारण मुहूर्त-
  • 20 मार्च को दोपहर 1 बजकर 41 मिनट से शाम 4 बजकर 7 मिनट तक।
हरिवास समाप्त होने का समय
  • 20 मार्च 12 बजकर 30 मिनट पर।
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पापमोचिनी एकादशी व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु युधिष्ठिर से कहते है ‘‘राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने-अनजाने में पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। 

इस वन में एक दिन मंजुघोषा नामक अप्सरा की नजर ऋषि पर पड़ी तो वह उन पर मोहित हो गयी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु यत्न करने लगी। कामदेव भी उसी समय उधर से गुजर रहे थे कि उनकी नजर अप्सरा पर गई और वह उसकी मनोभावना को समझते हुए उसकी मदद करने लगे। इस तरह अप्सरा अपने यत्न में सफल हुई और ऋषि कामपीड़ित हो गये। 

काम के वश में होकर ऋषि शिव की तपस्या का व्रत भूल गये और अप्सरा के साथ रमण करने लगे। कई वर्षों के बाद जब उनकी चेतना जगी तो उन्हें एहसास हुआ कि वह शिव की तपस्या से वह विरत हो चुके हैं, उन्हें तब उस अप्सरा पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने अप्सरा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया। 

श्राप से दुःखी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिये अनुनय करने लगी। अप्सरा की याचना से द्रवित हो मेधावी ऋषि ने उसे विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिये कहा। भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था, अतः ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया, जिससे उनका पाप नष्ट हो गया। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गई। पाप से मुक्त होने के पश्चात अप्सरा को सुन्दर रूप प्राप्त हुआ और वह स्वर्ग के लिये प्रस्थान कर गई। 
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