झांसी। मुहर्रम के जुलूस में इस बार फिर बढ़ई की मस्जिद (ताजिया) आगे होगी। सांप्रदायिक सौहार्द की इस परंपरा की नींव महारानी लक्ष्मीबाई ने रखी थी। लेकिन, एक सौ साठ साल के लगातार सफर के बाद पिछले साल यह परंपरा टूट गई थी, जिसे फिर से जीवित कर लिया गया है। सन 1855 में यह होड़ इस हद तक पहुंच गई कि ताजियेदारों में विवाद की स्थिति पैदा हो गई। मामला वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के दरबार में पहुंचा। रानी ने अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता का परिचय देते हुए आदेश दिया कि जुलूस में आगे किसी मुस्लिम का ताजिया नहीं, बल्कि बल्देव बढ़ई का मस्जिद के आकार का ताजिया रहेगा।
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तब से ही यह परंपरा अनवरत रूप से चली आ रही थी। बल्देव के बाद उसके आगे की पीढ़ियां रानी के फरमान को आगे बढ़ाती आईं। साल 2005 से बल्देव बढ़ई की पांचवीं पीढ़ी के प्रदीप शर्मा ताजिया तैयार कर रहे थे। लेकिन, पिछले साल घरेलू कारणों से वह ताजिया नहीं बना पाए थे, जिससे एक सौ साठ साल बाद यह परंपरा टूट गई थी, परंतु इस बार उन्होंने पूरी शिद्दत के ताजिया तैयार किया है।
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बल्देव ने बनाया था रानी के पुत्र का पालना
रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव के लिए बल्देव बढ़ई ने लकड़ी का पालना तैयार किया था, जिसमें शानदार नक्काशी की गई थी। इसी से प्रभावित होकर बल्देव को मुहर्रम के जुलूस के लिए ताजिया निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने मस्जिद के आकार का ताजिया बनाया था। इसी वजह से इस ताजिये को बढ़ई की मस्जिद के नाम से जाना जाता है। बल्देव के निधन के बाद उनके वंशज लल्ला उस्ताद, धर्मदास, दयाराम इस जिम्मेदारी को आजीवन निभाते रहे। अब उनकी पांचवीं पीढ़ी के प्रदीप शर्मा इस जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं।
दूसरे नंबर पर रहता है बाईसाब का ताजिया
मुहर्रम के जुलूस में सबसे आगे बढ़ई की मस्जिद चलती है, तो दूसरे नंबर पर रानी लक्ष्मीबाई (बाईसाब) का ताजिया चलता है। 1855 में हुए विवाद के अगले साल से रानीमहल के पास ताजिया सजाया जाने लगा था, जो बाईसाब के ताजिये के नाम से जाना जाता है। रानी ने इस ताजिये की जिम्मेदारी शहर कोतवाल को सौंपी थी, यह परंपरा आज भी कायम है। अब भी इस ताजिये पर आने वाला खर्च शहर कोतवाल ही वहन करते हैं।