मृत्यु जीवन का अंत नहीं है जो मरता है उसे वापस कर्मों के अनुसार जन्म लेना पड़ता है। लेकिन जिस मोक्ष मिल जाता है वह फिर जन्म नहीं लेता ऐसा गीता में कहा गया है। मार्गशीर्ष एकादशी के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने यह बात अर्जुन को बतायी थी। इसलिए इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। मोक्ष की चाहत रखने वालों को इस एकादशी का व्रत रखना चाहिए ऐसा शास्त्रों में बताया गया है। इस एकादशी के बारे में शास्त्रों पुराणों में और भी बहुत कुछ कहा गया है जान लीजिए।
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मोक्ष की चाहत रखने वालों के लिए साल की सबसे खास एकादशी
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महाभारत गीता उपदेश
इस एकादशी की कथा का उल्लेख करते हुए पद्म पुराण में बताया गया है कि वैखानस नाम के राजा को स्वप्न में उनके मृत पिता ने बताया कि वह नर्क भोग रहे हैं और उन्हें कष्ट से मुक्त कराएं। ऐसे में जब राजा वैखानस पर्वत ऋषि के पास समस्या का समाधान लेकर आए तो ऋषि ने अंतदृष्टि से पता किया कि राजा के पिता अपने पूर्व जन्म में एक पत्नी के प्रेम में इतने डूब गए कि दूसरी पत्नी का उन्हें ख्याल ही नहीं रहा।
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भगवान विष्णु
राजा के पिता ने अपनी दूसरी पत्नी को विरह की आग में जलने के लिए छोड़ दिया था। पति प्रेम से वंचित पत्नी की आहों के कारण वैखानस के पिता को नर्क भोगना पड़ रहा है। पर्वत ऋषि ने बताया कि इस समस्या का सामधान यह है कि तुम मोक्षदा एकादशी का व्रत रखकर इसका पुण्य अपने पिता को दे दो।
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विष्णु शिव
राजा वैखानस ने मोक्षदा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन पारण करके इसका पुण्य अपने पिता को दे दिया। इस इस पुण्य से राजा के पिता स्वर्ग चले गए और कुछ समय बाद उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो गई। इस एकादशी के दिन गीता पाठ का बड़ा महत्व है।
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नारद विष्णु भगवान
भगवान श्री कृष्ण ने इसी एकादशी के दिन गीता का ज्ञान दिया था इसलिए इस दिन गीता पाठ का बड़ा महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता में अठारह अध्याय हैं। गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को विश्वरूप के दर्शन का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में बताया गया है कि अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त देखा। श्री कृष्ण में ही अर्जुन ने भगवान शिव, ब्रह्मा एवं जीवन मृत्यु के चक्र को भी देखा।
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महाभारत
शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नियमित गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है उसे भगवान विष्णु के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा मृत्यु के पश्चात परमात्मा के स्वरूप में विलीन हो जाती है अर्थात उन्हें मोक्ष मिल जाता है। गीता का अठारवां अध्याय मोक्ष संयास योग के नाम से जाना जाता है। जो व्यक्ति समय के अभाव में संपूर्ण गीता का पाठ नहीं कर पाता हैं वह केवल अठारवें अध्याय का पाठ करें तो उन्हें संपूर्ण गीता पाठ का लाभ मिल जाता है।
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भगवत गीता
शास्त्रों में बताया गया है कि गीता जयंती के दिन श्रीमद्भगवद्गीता की पूजा करके आरती करनी चाहिए इसके पश्चात गीता का पाठ करना चाहिए। इससे महापुण्य की प्राप्त होती है।