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Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति से होता है देवताओं के दिन की गणना का प्रारम्भ, जानें पौराणिक महत्व

Mon, 12 Jan 2026 02:10 PM IST
ज्योति मेहरा ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी

सार

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
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मकर संक्रांति 2026 - फोटो : Amar Ujala
Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। नाम चाहे अलग हों, लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है, और वह है; सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना।

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियां चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है।

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देवताओं के दिन की गणना - फोटो : Adobe Stock
देवताओं के दिन की गणना
शास्त्रों के अनुसार, देवताओं के दिन की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है, सूर्य जब दक्षिणायन में रहते हैं तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है। सामान्यतः सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छह-छह माह के अन्तराल पर होती है।सर्वविदित है कि पृथ्वी की धुरी 23.5 अंश झुकी होने के कारण भगवान सूर्य छह माह पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के निकट होते हैं और शेष छह माह दक्षिणी गोलार्द्ध के निकट होते हैं।
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मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व - फोटो : Adobe Stock
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस दिन से सूर्य के उत्तरायण हो जाने से प्रकृति में बदलाव शुरू हो जाता है.शीत के कारण से ठिठुरते लोगों को भगवान सूर्य के उत्तरायण होने से शीत ऋतु से राहत मिलना आरंभ होता है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है, इसलिए ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण है।भारतवर्ष के लोग इस दिन सूर्यदेव की आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

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मकर संक्रांति का पौराणिक कथा - फोटो : Adobe stock
मकर संक्रांति का पौराणिक कथा
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां के पर्व त्योहार का संबंध काफी कुछ कृषि पर निर्भर करता है। भारत के हर राज्य में मकर संक्रांति को जिस श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस त्योहार से कुछ धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। इस त्योहार का उल्लेख हमारे कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है, जो इसके धार्मिक महत्व को उजागर करते हैं। भगवान कृष्ण की वाणी कही जाने वाली धार्मिक ग्रंथ "गीता" में वर्णित है कि उत्तरायण के छह महीने देवताओं के दिन का समय होते हैं और दक्षिणायन के छह महीने देवताओं की रात का समय होते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण में अपने शरीर का बलिदान करता है (मृत्यु को प्राप्त होता है) उसे कृष्ण लोक में स्थान मिलता है और मोक्ष प्राप्त होता है, जबकि दक्षिणायन में मरने वाले को पुनर्जन्म लेना पड़ता है। 
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मकर संक्रांति का पौराणिक कथा - फोटो : adobe stock
महाभारत काल में भीष्म पितामह को मृत्यु की इच्छा का वरदान प्राप्त था। बाणों से भरी शय्या पर लेटे होने के बावजूद उन्होंने दक्षिणायन में प्राण त्याग नहीं किए और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश करने की प्रतीक्षा की। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन जब भगवान सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर गये, तब भीष्म पितामह ने प्राण त्याग दिए। मकर संक्रांति के संदर्भ में एक और धार्मिक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार यशोदा माता ने भगवान कृष्ण को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत रखा था। गंगा अवतरण की कथा भी मकर संक्रांति से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन मां गंगा ने भागीरथ मुनि का अनुसरण किया और सागर से मिलीं। मां गंगा और सागर के इस मिलन के कारण ही मकर संक्रांति पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगासागर में स्नान करने आते हैं।
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Makar Sankranti 2026 - फोटो : adobe stock
मकर संक्रान्ति के दिन गंगा स्नान, सूर्योपासना व तीर्थ स्थलों पर स्नान दान विशेष पुण्यकारी होता है। ऐसी मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है. मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगा स्नान एवं गंगा तट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है. इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगा सागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है।
 
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मकर संक्रांति पर तिल का महस्त - फोटो : Freepik.com
मकर संक्रांति के दिन तिल का बहुत महत्व है, तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल के तेल द्वारा शरीर में मालिश, तिल से ही यज्ञ में आहुति, तिल मिश्रित जल का पान, तिल का भोजन इनके प्रयोग से मकर संक्रांति का पुण्य फल प्राप्त होता है और पाप नष्ट हो जाते हैं।  इस दिन खिचड़ी का सेवन करने का भी वैज्ञानिक कारण है। खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है. अदरक और मटर मिलाकर खिचड़ी बनाने पर यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करती है।
 
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मकर संक्रांति 2025 - फोटो : अमर उजाला
मकर संक्रांति पर पतंग का महत्व
मकर संक्रांति पर अनेक स्थानों पर पतंग महोत्सव मनाया जाता है। भारत के अनेक नगरों में मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परम्परा है. यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में प्रातः का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थ्य वर्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अतः पतंग उड़ाने का एक उद्देश्य कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना भी है। इस प्रकार मकर संक्रांति का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व होने के कारण हम सब को इस पर्व को विशेष रूप से मनाना चाहिए।

वैदिक विभूषण ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी

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