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Mahashivratri 2018: भगवान शिव के भक्तों को जरूर जाननी चाहिए ये 10 बातें

Sat, 10 Feb 2018 07:58 AM IST
मोक्षदा शास्त्री
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संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो शिव के बिना हो। सृष्टि का आधार ही शिव है। यदि रात शिव है, तो दिन भी शिव है। सुख शिव है, तो दुख भी शिव है। देवों के देव शिव का स्वरूप चैतन्य है। शिव ही आदि हैं और वही अनंत हैं। वे योगी हैं, तो गृहस्‍थ जीवन के आदर्श भी। क्या स्‍त्री, क्या पुरुष... हर किसी के पूज्य हैं भगवान शिव। वह संहारकर्ता भी हैं और सृष्टि के रचनाकार भी। भगवान शिव असीम हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं, अविकारी हैं, निराकार हैं। जिसका व्यक्तित्व इतना विशाल हो, तो फिर मनुष्य उनसे प्रभावित तो होगा ही। 
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एक आदर्श पति के रूप में शिव
 
शिवजी आदर्श पति कैसे हैं?, इस सवाल का जवाब है शिवजी का व्यक्तित्व, उनका भावुक मिजाज और तपस्वी स्वभाव। वह व्यक्ति भगवान ही होता है, जो अपनी भावनाओं पर संयम रख सके। फिर शिवजी तो साक्षात् भगवान ही हैं, उनमें यह खूबी मौजूद है। भगवान शिव अपनी पत्नी के प्रति संपूर्ण भावनाओं से समर्पित हैं। भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से प्यार, आदर और समानता के साथ पेश आते हैं। वे अपनी पत्नी पार्वती को अपने साथ बगल में बैठाते हैं, न कि अपने चरणों के पास। अपनी पत्नी को उन्होंने हमेशा बराबरी का महत्व दिया है। 

उन्हें कभी अपने अधीन नहीं माना। पति-पत्नी के रूप में भगवान शिव और मां पार्वती की अनूठी जोड़ी की इस संसार में किसी भी प्रकार से तुलना नहीं की जा सकती। यही भगवान शिव की कुछ विशेषताएं हैं, जो उन्हें आदर्श पति के रूप में स्थापित करती हैं, इसलिए आज भी अविवाहित लड़कियां पति के रूप में भगवान शिव जैसे व्यक्ति की कामना करती हैं।
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संतुलन सिखाते हैं शिव
शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। उनमें किसी चीज को लेकर स्वीकृति भी है और अस्वीकृति भी। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्द्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। भगवान शिव में किसी चीज की रचना करने और उसे नष्ट करने की भी क्षमता है। संसार की सारी विषमताओं से घिरे होने के बावजूद अपनी चित्तवृत्ति को शांत एवं स्थिर बनाए रखना ही योग का स्वरूप है और भगवान शिव हमें इसी योग की शिक्षा देते हैं। वे हमें जीवन में संतुलन का पाठ पढ़ाते हैं। 

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निष्पक्षता का पाठ 
भगवान शिव सभी के प्रति निष्पक्ष भाव रखते हैं। चाहे देव हो या दानव। देवदूत हो या प्रेत। भगवान शिव के लिए उनका साधक एक भक्त ही है। यह मायने नहीं रखता कि वह कौन है? अगर कोई भी सच्ची भक्ति के साथ उनकी आराधना करे, तो वे सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। चाहे वह दिल से राक्षस ही क्यों न हो? भगवान शिव की इसी विशेषता के लिए उन्हें 'भोलेनाथ' के नाम से भी पुकारा जाता है। अर्थात् भगवान शिव देवों और दैत्यों में किसी भी प्रकार का भेद नहीं करते हैं।
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नृत्य के देवता
भगवान शिव नृत्य के भगवान हैं, इसलिए उनका एक नाम नटराज भी है। नटराज को नृत्य का देवता मानते हैं। आमतौर पर भगवान शिव को विनाश के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन बहुत ही कम लोग यह जानते हैं कि शिवजी को संगीत और नृत्‍य से प्यार है। शिव के नटराज स्वरूप का एक संदेश यह भी है कि अज्ञानता को ज्ञान, संगीत और नृत्‍य से ही दूर किया जा सकता है। शिव के तांडव के दो स्‍वरूप हैं। पहला उनके क्रोध को दिखाता है और दूसरा आनंद प्रदान करने वाला तांडव। 

धर्म ग्रंथों के मतानुसार, शिव के आनंद तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विलय हो जाता है। नटराज का जो पांव उठा हुआ है, वह मोक्ष को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि शिव मोक्ष के मार्ग का सुझाव देते हैं। कहा जाता है कि शिव के चरणों में मोक्ष है और जो बौना शिव के पैरों तले दबा हुआ है, वह अज्ञान का प्रतीक है। शिव जी अज्ञान का विनाश करते हैं।
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सरल और सादा जीवन
भगवान शिव की सरलता सर्वविदित है। ब्रह्मांड के भगवान होने के बावजूद भगवान शिव योगीश्वर हैं। वे राजा की तरह वास नहीं करते, बल्कि श्मशान में निवास करते हैं। यहां तक कि वे अपने शरीर पर किसी भी प्रकार का कीमती वस्‍त्र या आभूषण भी धारण नहीं करते हैं। बाघ की खाल, रुद्राक्ष की माला, गले में सर्प और शरीर पर भस्म ही वे धारण करते हैं। भगवान शिव की ये सारी बातें भौतिकवाद के अंत को दर्शाती हैं।

संसार मोह-माया का प्रतीक है, जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव अपने इस स्वरूप से संदेश देते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। अगर व्यक्ति सादा जीवन जीता है, तो उसकी इच्छाएं कम होगी और उसका मन शांत रहेगा। जब आपके पास खुद के लिए सीमित विकल्प होगा, तब चीजों के चयन करने में आपकी कम ऊर्जा खर्च होगी। इससे आपके पैसे की भी बचत होगी आैर आर्थिक तौर पर होने वाला तनाव भी नहीं होगा। जितना सहज रहेंगे, लोग आपसे ज्यादा जुडेंगे। 
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जीवन में संतोष
भगवान शिव को जो चीज सबसे ज्यादा अलग बनाती है, वह है उनका आशुतोष रूप। दरअसल, आशुतोष का मतलब होता है, जो थोड़े से ही प्रसन्न हो जाए। भगवान शिव अपने भक्तों से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए उनका एक अन्य नाम आशुतोष भी है। शिव को सच्ची भक्ति के साथ केवल जल एवं बिल्वपत्र अर्पित करके भी आप खुश कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि आपके पास जो है, उसी में खुश रहना सीखें। ज्यादा पाने की ललक में अपनी खुशियों को यूं ही न गंवाएं। 

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विविधता में एकता
अगर हम शिव परिवार पर गौर करें, तो हमें यहां भी विविधता में एकता दिखाई देती है। शिव का वाहन नंदी (बैल) है, वहीं गले में सर्प भी धारण करते हैं। माता पार्वती का वाहन शेर, गणेश जी का वाहन चूहा और कार्तिकेय का वाहन मोर है। अगर गौर करें, तो बैल का परम शत्रु सिंह है। सांप का प्रिय भोजन चूहा है, जबकि मोर का भोजन सांप है। परस्पर शत्रु होते हुए भी ये सब एक साथ हैं। एक ही परिवार में प्रेम भाव से रहते हैं। इसका सार यही है कि यदि हमें परस्पर अंतर विरोधों और संघर्षों का सामना भी करना पड़े, तब भी हमें अपने कर्तव्यों का समुचित पालन करते रहना चाहिए।  यही शुभ है, यही शिवत्व का सार है।

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बदलने का हर किसी को मौका दो
सबको माफ करने वाले भगवान शिव को 'भोलेनाथ' भी कहा जाता है, जोकि उनकी दयालुता की विशेषता को दर्शाता है। अगर हम बुरे कर्मों के लिए भगवान शिव से माफी मांगें, तो वे हमें आसानी से माफ कर देते हैं। शिव के इस रूप से हम यह सीख सकते हैं कि यदि हम किसी को बदलना चाहते हैं, तब उसे दंड देने की बजाय माफी देना ज्यादा अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। 
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स्‍त्री-पुरुष दोनों समान हैं
शिव का एक स्वरूप अर्धनारीश्वर है, जो प्रकृति में नर-नारी की सक्रिय भागीदारी के साथ-साथ बराबरी की दर्जा प्रदान करने की प्रेरणा प्रदान करता है। इस में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो शिव के बिना हो। सृष्टि का आधार ही शिव है। यदि रात शिव है, तो दिन भी शिव है। सुख शिव है, तो दुख भी शिव है। देवों केस्वरूप में भगवान शंकर का आधा शरीर स्त्री का तथा आधा शरीर पुरुष का है।

भगवान शिव का यह अवतार महिला व पुरुष दोनों की समानता का संदेश देता है। इस रूप से भगवान शिव ने यह संदेश दिया है कि समाज, परिवार तथा जीवन में जितना महत्व पुरुष का है, उतना ही स्त्री का भी है। एक-दूसरे के बिना इनका जीवन अधूरा है, यह दोनों एक-दूसरे को पूरा करते हैं। शिव के जीवन से जुड़ी और भी कई सारी बातें, जिनसे हमें सीख लेनी चाहिए।
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