करवा चौथ का धार्मिक महत्व
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करवा चौथ का धार्मिक महत्व
करवा चौथ का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। नारद पुराण में इसे ‘करकाख्यं व्रतम’ यानी करक व्रत के नाम से बताया गया है। नारद पुराण के पूर्वार्ध के अध्याय 113 में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर व्रत और पूजा का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश और चंद्र देव की पूजा की जाती है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना के साथ यह व्रत करती हैं। करवा चौथ केवल व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और पारिवारिक मंगल की कामना से जुड़ी परंपरा के रूप में भी देखा जाता है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक रूप से सोलह श्रृंगार करती हैं, पूजा की तैयारी करती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं। शाम की पूजा के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया जाता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।