महाभारत काल से जुड़ी कथा
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महाभारत काल से जुड़ी कथा
जितिया व्रत से जुड़ा एक अन्य प्रसंग महाभारत काल से जोड़ा जाता है।
युद्ध के बाद अश्वत्थामा ने प्रतिशोध की भावना में पांडवों के शिविर में प्रवेश किया। वहां उसने सो रहे द्रौपदी के पांच पुत्रों का वध कर दिया। बाद में अर्जुन ने उसका पीछा किया और उसकी दिव्य मणि छीन ली।
प्रतिशोध की आग में अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को भी नष्ट करने का प्रयास किया। उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। इस घटना से अजन्मे बालक का जीवन संकट में पड़ गया।
कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से उस अजन्मे शिशु की रक्षा की और उसे जीवन प्रदान किया। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके गर्भ में ही संकट से बचाए जाने और जीवन प्राप्त करने के प्रसंग को जीवित पुत्र की रक्षा की भावना से जोड़कर देखा जाता है।
इसी वजह से जीवित्पुत्रिका व्रत को संतान की दीर्घायु और रक्षा की कामना से जुड़ा पर्व माना जाता है। जितिया की विभिन्न कथाएं भले अलग-अलग प्रसंगों पर आधारित हों, लेकिन इनके केंद्र में संतान के प्रति ममता, त्याग, रक्षा और सुखी जीवन की कामना का भाव समान रूप से दिखाई देता है। व्रत के दिन इन कथाओं का श्रवण इसी धार्मिक भावना को स्मरण करने की परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
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