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दीवाली 2019: उत्सवों और त्योहारों में रंग भरती रंगोली

Fri, 18 Oct 2019 08:18 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा में रंग-बिरंगी रोशनी, सजावट और पटाखे जैसी चीजें तो माहौल को खुशनुमा बनाती ही हैं, लेकिन रंगोली भी इस त्योहार को खुशनुमा बनाने में अहम भूमिका अदा करती है।
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 रंगोली का भी अपना विज्ञान है। यह घर में सकारात्मक ऊर्जा लाती है और उसे बाहर नहीं जाने देती । इसे बनाते वक्त मस्तिष्क के अधिक क्रियाशील होने से तनाव छू-मंतर हो जाता है । इसी तरह रंगोली बनाने के दौरान अंगुली और अंगूठा मिलकर ज्ञानमुद्रा बनाते हैं, जो मस्तिष्क को ऊर्जावान और सक्रिय बनाती है। दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा में रंग-बिरंगी रोशनी, सजावट और पटाखे जैसी चीजें तो माहौल को खुशनुमा बनाती ही हैं, लेकिन रंगोली भी इस त्योहार को खुशनुमा बनाने में अहम भूमिका अदा करती है।
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भारत में आए दिन उत्सवों का मेला लगा रहता है। इन उत्सवों और संस्कारों में रंग भरती है रंगोली। चाहे हवन की वेदी हो, विवाह हो, नामकरण हो या यज्ञोपवीत जैसा शुभ कार्य, इन सभी में रंगोली बनाने की परंपरा मुख्य है । रंगोली में स्वस्तिक, कमल के फूल, लक्ष्मीजी के चरण के अलावा अन्य कलात्मक डिजाइन प्रमुख होते हैं। भारतीय त्योहार रंगों के बगैर अधूरे लगते हैं । कहा भी गया है कि रंग हमें खुशहाली प्रदान करते हैं और त्योहारों में जान डाल देते हैं । रंगोली को अल्पना भी कहा जाता है। अल्पना वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित चौसठ कलाओं में से एक है। संस्कृत के इस शब्द का अर्थ है लीपना अथवा लेपन करना। रंगोली बनाने के पहले आंगन को लीपा जाता है। 
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कई क्षेत्रों में रंगोली को रंगावली भी कहा जाता है। यह शब्द रंग और आवली अर्थात् पंक्ति से मिलकर बना है जिसका अर्थ है रंगों की एक पंक्ति। भारत में रंगोली का आगमन मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता में मिलता है। लोक मान्यता के आधार पर जब रावण का वध करके भगवान श्रीराम माता सीता के साथ 14 वर्षों का वनवास काट अयोध्या वापस आए, तब अयोध्यावासियों ने पूरी अयोध्या को दीपक तथा रंगोली से सजाया था। तब से ही प्रत्येक वर्ष दीपावली पर रंगोली बनाने का रिवाज शुरू हुआ । रंगोली के साथ मां लक्ष्मी की मूर्ति और उनके पद चिह्न रखने का रिवाज भी तभी से शुरू हुआ। इसके अलावा एक मान्यता यह भी है कि तमिलनाडु क्षेत्र की पूजनीय देवी मां थिरूमाल का विवाह मर्गाजी से दिवाली के महीने में हुआ था, इसलिए इस पूरे महीने के दौरान प्रत्येक घर में रंगोली बनाने की शुरुआत हुई। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से मां थिरूमाल की कृपा पूरे परिवार को खुश रखेगी। प्राचीनकाल में रंगोली के चित्र धार्मिक,कलात्मक तथा आस्था के प्रतीक थे,जो इस बात को पुख्ता करते थे कि ये कलात्मक चित्र गांव को धन-धान्य से भरे रखेंगे ।

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देश के विभिन्न प्रांतों में रंगोली को अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। जैसे कर्नाटक में रंगोली, तमिलनाडु में कोलम, पश्चिम बंगाल में अल्पना, राजस्थान में मांडना, उत्तरप्रदेश में चौक-पूजन, छत्तीसगढ़ में चौक पूरना, महाराष्ट्र में रंगोली तथा संस्कार भारती और गुजरात में साथिया के नाम से इसे जाना जाता है। रंगोली बनाने के लिए रंगीन चौक पाउडर, रेत, चावल की रंग-बिरंगी चूरी या पाउडर, आटा, चावल के दाने, चूना, प्राकृतिक रंग, फूल और फूलों की पंखुडियां, हल्दी, रोली, अक्षत इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान समय में मोती, सितारे, कुंदन, कांच के विभन्न शेप वाले टुकड़े तथा अन्य कलात्मक वस्तुएं रंगोली सजाने के काम में लाई जाती हैं। अब तो रंगोली के कुछ जानकार मार्डन तकनीक से बड़ी-बड़ी रंगोली बहुत कम समय में बनाने में पारंगत हो गए हैं।
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कहा जाता है कि रंगोली घर में सकारात्मक ऊर्जा को लाती है और उसे बाहर नहीं निकलने देती । रंगोली बनाते समय मस्तिष्क के अधिक क्रियाशील होने से तनाव छू-मंतर हो जाता है । इसी तरह रंगोली बनाने के दौरान अंगुली और अंगूठा मिलकर ज्ञानमुद्रा बनाते हैं जो मस्तिष्क को ऊर्जावान और सक्रिय बनाती है। एक्यूप्रेशर के हिसाब से भी यह मुद्रा बौद्धिक विकास को बढ़ाती है । वास्तु के अनुसार घर में रंगोली बनाने से मां लक्ष्मी बेहद प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है। रंगोली को हटाने के नियम भी होते हैं । रंगोली को झाडू या कपड़े से पोछना शुभ नहीं माना जाता है। वास्तु के अनुसार रंगोली को जल की सहायता से हटाया जाना चाहिए, क्योंकि हिंदू धर्म में जल पवित्र कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
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रंगों की कला
रंगोली हमारे देश की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा और लोक-कला है। अलग अलग सूबों में रंगोली के नाम और उसकी शैली में भले ही भिन्नता लिए हो, लेकिन इसे बनाने के पीछे निहित भावना और संस्कृति में पर्याप्त समानता है। रंगोली की यही विशेषता इसे विविधता देती है और इसके विभिन्न आयामों को भी दिखाती है। इसे सामान्यतः त्योहार, व्रत, पूजा, उत्सव विवाह आदि शुभ अवसरों पर सूखे और प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता है। इसमें साधारण ज्यामितिक आकार हो सकते हैं या फिर देवी देवताओं की आकृतियां, लेकिन इन सभी का प्रयोजन सजावट और सुमंगल  है। इन्हें प्रायः घर की महिलाएं बनाती हैं।
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