खेतों में सरसों के पीले फूलों से प्रकृति भी सुंदर और मादक दिखाई देती है। सौंदर्य और मादकता का यह संगम पूरे जगत को मोहित करने लगता है। इसे हम ऋतुराग भी कहते हैं, क्योंकि नृत्य और गान के बिना होली पूरी होती ही नहीं। फिर जहां नृत्य, संगीत और गान होगा, वहां उल्लास तो होगा ही। वसंत ऋतु का मदमस्त मौसम मानव मन में सहज ही कामनाएं उद्दीप्त कर देता है। होली वस्तुत: मलिनताओं के दहन और तमस को जलाने का महाअनुष्ठान है। यह प्रेम की वह रसधारा है, जिसमें समूचा समाज एक साथ भीगकर अपने अंतस के कलुष को धोता है। इस पर्व के राग, रंग, हंसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती से सामाजिक विषमताएं टूटती हैं और वर्जनाओं से मुक्ति मिलती है।