होलाष्टक की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यता
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एक अन्य कथा के अनुसार, इन्हीं आठ दिनों में असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ने के लिए अत्याचार किए थे। लेकिन अपार कष्टों के बाद भी प्रह्लाद अपनी भक्ति में अडिग रहे। आखिर में उनकी रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन मनाया जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने होली से पहले आठ दिनों तक गोपियों के साथ रंगोत्सव मनाया था। दुलहंडी के दिन रंगों से भीगे वस्त्र अग्नि को अर्पित किए गए, जिसके बाद यह परंपरा उत्सव के रूप में स्थापित हो गई। इस प्रकार होलाष्टक केवल वर्जनाओं का समय नहीं है, बल्कि यह भक्ति, तैयारी और आत्मसंयम का भी काल है, जो हमें होली के उल्लासपूर्ण पर्व के लिए मानसिक और सामाजिक रूप से तैयार करता है।