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ईद मुबारकः इस एक काम को किए बिना अदा नहीं होती ईद की नमाज

Sun, 25 Jun 2017 03:05 AM IST
amarujala.com- Presented by: किरण सिंह
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इस्लाम धर्म में ईद सबसे बड़ा त्यौहार होता है। दुनिया भर में मुसलमानों के लिए ये एक खास त्यौहार होता है, जिसका इंतजार उन्हें रहता है। रमजान के महीने का आखिरी रोजा यानि 30वें रोजे के बाद चांद देखकर ईद मनाई जाती है, जो हिजरी कैलंडर 10वें महीने की पहली तारीख होती है। ऐसा माना जाता है क‌ि कुरान का अवतरण रमजान के महीने में ही हुआ था। इसी वजह से इस माह में ज्यादा कुरान पढ़ने का फर्ज है।
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हिजरी कैलेण्डर के अनुसार ईद साल में दो बार आती है। एक ईद होती है ईद-उल-फितर और दूसरी ईद-उल-जुहा। ईद-उल-फितर को मीठी ईद भी कहा जाता है, जबकि ईद-उल-जुहा को बकरीद के नाम से भी जाना जाता है।
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30 दिनों तक सख्त नियमों का पालन करते हुए रोजेदार अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हैं। इसीलिए इसे सब्र का माह भी कहा जाता है, क्योंकि रमजान के माह में रोजेदार खाने पीने में सब्र रखते हैं।

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फितर को अरबी भाषा में फितरा कहा जाता है, जिसका मतलब एक दान होता है। दान या जकात ‌किए बिना ईद की नमाज नहीं होती। कहते हैं कि ईद की नमाज से जरूरमंद लोगों को दान दिया जाता है।
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माना जाता है‍ कि रमजान के महीने की 27वीं रात, जिसे शब-ए-क़द्र को कहा जाता है। जिस दिन क़ुरान का नुज़ूल यानी अवतरण हुआ था।
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