दशहरा यानी विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन जहां भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और मां दुर्गा की महिषासुर पर जीत का उत्सव मनाया जाता है, वहीं कई जगहों पर शस्त्र पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है। इस अवसर पर लोग अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ कामकाज में इस्तेमाल होने वाले औजारों की भी पूजा करते हैं। आखिर दशहरे पर शस्त्र पूजन क्यों किया जाता है और इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं, इसके बारे में बेहद कम लोग ही जानते हैं। ऐसे में आइए इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं।
शस्त्र पूजा का धार्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में शस्त्रों को शक्ति, साहस, आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना गया है। शस्त्र पूजा का उद्देश्य केवल हथियारों की आराधना करना नहीं, बल्कि शक्ति का सदुपयोग करने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प लेना भी है। विजयादशमी को नई शुरुआत और विजय के लिए शुभ अवसर मानने की परंपरा है। इसी कारण कई स्थानों पर सैनिक, पुलिसकर्मी और सुरक्षा से जुड़े लोग अपने हथियारों की पूजा करते हैं। कारीगर, किसान और अन्य पेशों से जुड़े लोग भी अपने औजारों को पूजते हैं।