सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है। इसमें आने वाले चार महीने जिसमें सावन, भादौ,आश्विन और कार्तिक का महीना आता है। चातुर्मास के चलते एक ही स्थान पर रहकर जप और तप किया जाता है। बर्षा ऋतु और बदलते मौसम से शरीर में रोगों का मुकाबला करने अर्थात रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। दरअसल इन 4 महीनो में व्यक्ति की पाचनशक्ति भी कमजोर हो जाती है इससे अलावा भोजन और जल में हानिकारक बैक्टीरिया की तादाद भी बढ़ जाती है। इन कारणों से वैदिक काल से ही यात्रा करना या मंगल आयोजन करना जन हिताय में बंद कर दिया जाता था।
आज भी जैन मुनि चातुर्मास में एक ही स्थान पर बैठकर जप, तप, साधना व प्रवचन करते हैं। रामचरितमानस में एक प्रसंग है जिसमें भगवान श्रीराम वनवास के समय चिंता व्यक्त करते हैं कि चौमासा भी बीत चुका है,अब हमें लंका की ओर प्रस्थान कर देना चाहिए। इन महीनों में खान-पान, व्रत के नियम और संयम का पालन करना चाहिए। यह भी मान्यता है कि आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं, इसलिए इस समय किसी प्रकार के मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं। मांगलिक कार्यों की फिर शुरुआत कार्तिक मास की देवउत्थान एकादशी के दिन होती है। चातुर्मास के दौरान यानी 4 माह में विवाह संस्कार, गृह प्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध माने गए हैं। चातुर्मास के इस काल में व्रत-पूजन का विशेष लाभ मिलता है।आइए जानते हैं कि चातुर्मास में किन महीनों में किन देवी-देवताओं की पूजा विशेषरूप से फलदायी है।