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दुर्गा पूजा 2026: कल्पारंभ से विसर्जन तक, जानें बंगाल की दुर्गा पूजा की ये अनोखी परंपराएं

सार

बंगाली समाज में दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि बेटी के मायके लौटने का उत्सव है। इस दौरान मां दुर्गा का भव्य स्वागत होता है। आइए जानते हैं दुर्गा पूजा 2026 की तिथियां, पूजा का पूरा कार्यक्रम और अनोखी परंपराएं।

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दुर्गा पूजा 2026 - फोटो : AI
बंगाली समाज में माँ दुर्गा को केवल देवी ही नहीं, बल्कि घर आई बेटी के रूप में प्यार से देखा जाता है। जब वे मायके आती हैं, तो पूरे आदर और उत्सव के साथ उनका स्वागत होता है। इस बार 10 साल बाद ऐसा शुभ योग बना है कि सप्तमी तिथि दो दिन की होने के कारण यह उत्सव चार के स्थान पर पूरे पाँच दिन (16 से 20 अक्टूबर) तक चलेगा। आइए जानते हैं इस पावन पर्व का पूरा कार्यक्रम और इसकी अनोखी परंपराएँ।

1. षष्ठी तिथि का समय
आरंभ: 16 अक्टूबर 2026, दोपहर 03:25 बजे से
समापन: 17 अक्टूबर 2026, सुबह 05:54 बजे तक
 
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तिथि अनुसार पूजा का क्रम और गतिविधियां - फोटो : adobe stock
2. तिथि अनुसार पूजा का क्रम और गतिविधियां
16 अक्टूबर (षष्ठी): कल्पारंभ, देवी का बोधन, अधिवास और आमंत्रण
17 एवं 18 अक्टूबर (सप्तमी): नवपत्रिका स्नान और प्राण-प्रतिष्ठा
19 अक्टूबर (अष्टमी): पुष्पांजलि और संधि पूजा में 108 दीये प्रज्वलित करना
20 अक्टूबर (नवमी): ढाक की थाप पर धुनुची नृत्य
21 अक्टूबर (दशमी): महिलाओं द्वारा सिंदूर खेला और माँ की प्रतिमा का विसर्जन
 
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बंगाली नवरात्रि उत्सव की अनोखी परंपराएँ - फोटो : freepik
3. बंगाली नवरात्रि उत्सव की अनोखी परंपराएँ
कल्पारंभ
दुर्गा पूजा के इस पहले अनुष्ठान में सुबह घट स्थापना और संकल्प लिया जाता है कि आने वाले दिनों में विधि-विधान से पूजन संपन्न होगा। इसे नवपत्रिका पूजा (कोलाबोऊ पूजा) से ठीक एक दिन पहले किया जाता है। इस दिन माँ दुर्गा को बेल के वृक्ष या कलश में पधारने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

निमंत्रण
षष्ठी तिथि की शाम को यह धार्मिक रस्म की जाती है। मान्यता है कि देवी माँ बेल के पेड़ की शाखाओं में निवास करती हैं, इसलिए उन्हें बेल के वृक्ष के पास जाकर अगले दिन की महासप्तमी पूजा के लिए सादर आमंत्रित किया जाता है। यदि षष्ठी तिथि का समय शाम से पहले समाप्त हो रहा हो, तो इसे पंचमी की शाम को भी किया जा सकता है।

अधिवास
बेल के पेड़ का पूजन करके उसे पवित्र किया जाता है और उसमें माँ दुर्गा का प्रतीकात्मक निवास कराया जाता है। इसे ही 'अधिवास' कहते हैं। इसके लिए सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे 24 मिनट पहले का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।

अकाल बोधन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, दक्षिणायन के समय देवता निद्रा में रहते हैं। जैसे भगवान श्री राम ने रावण वध से पूर्व माँ दुर्गा को जगाया था, ठीक वैसे ही शाम के समय प्रार्थना करके देवी माँ को निद्रा से जगाने के लिए बेल वृक्ष के नीचे कलश स्थापित किया जाता है। इसीलिए इसे 'अकाल बोधन' यानी असामयिक आह्वान कहा जाता है।

नवपत्रिका पूजा
महा सप्तमी के दिन होने वाली इस पूजा को कलाबाऊ पूजा भी कहते हैं। इस दिन नौ तरह के पौधों से बनी 'नवपत्रिका' को स्नान कराकर स्थापित किया जाता है और देवी कालरात्रि की पूजा के साथ निशा पूजा संपन्न होती है।

संधि पूजा
महाष्टमी के अंत की 24 मिनट और महानवमी की शुरुआत की 24 मिनट- इन कुल 48 मिनट के बीच के समय को 'संधिकाल' कहा जाता है। यह पूरे उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और भक्तिमय क्षण होता है। इस समय मिट्टी के 108 दीपक जलाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध बेलुड़ मठ में इस समय केले की सात्विक बलि देने की परंपरा निभाई जाती है।
 

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ढाक की थाप और धुनुची नृत्य - फोटो : adobe stock
4. ढाक की थाप और धुनुची नृत्य
ढाक की थाप: ढाक एक विशाल पारंपरिक ढोल होता है। जब ढाकी इसे अपनी खास लय में बजाते हैं, तो उसकी गूँज से पूरा पंडाल ऊर्जा और उत्साह से भर उठता है।
धुनुची नृत्य: शाम की आरती के समय मिट्टी के पात्र (धुनुची) में नारियल के छिलके, कपूर और धुना जलाकर भक्ति नृत्य किया जाता है। भक्त दोनों हाथों में जलती हुई धुनुची लेकर ढोल की ताल पर मग्न होकर नाचते हैं।
 
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सिंदूर खेला और विसर्जन - फोटो : instagram
5. सिंदूर खेला और विसर्जन
वरण रस्म: विजया दशमी पर माँ दुर्गा को मायके से विदा करने का समय होता है। विवाहित महिलाएँ पारंपरिक लाल-सफ़ेद साड़ी पहनकर देवी की पूजा (वरण) करती हैं, उन्हें सिंदूर, पान और मिठाई अर्पित कर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद लेती हैं।

सिंदूर खेला: पूजा के बाद सभी महिलाएँ आपस में एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिससे पूरा माहौल उत्सव के लाल रंग में रंग जाता है।
बेटी की विदाई का भाव: जैसे किसी बेटी को खुशी-खुशी मायके से ससुराल विदा किया जाता है, वैसे ही ढाक की धुन, शंखनाद और उलूध्वनि के बीच माँ दुर्गा को कैलाश पर्वत के लिए विदाई दी जाती है और प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

- शैली प्रकाश
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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