लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण शौरी जैसे बुजुर्ग नेताओं को हाशिये पर धकेलने के सवाल पर शांता कुमार ने कहा कि इनको भी मेरी तरह अब चुनाव लड़वाने का आनंद लेना चाहिए। मैंने हर परिस्थिति में अपने कर्त्तव्य को ध्यान में रखते हुए काम किया है। गीता पढ़ी तो बहुतों ने होगी, मगर हमने इसे जीया है।
अपनी आत्मकथा पर शांता ने कहा कि पार्टी के शुरुआती संघर्ष और पुराने लोगों का इतिहास कहीं समाप्त न हो जाए, इसलिए आत्मकथा लिख रहा हूं। अयोध्या मामले से लेकर वर्ष 2004 में मेरे केंद्रीय मंत्री के पद से त्यागपत्र देने जैसे कई पहलू आत्मकथा में होंगे। अब मैं लेखक पहले, राजनेता बाद में हूं।
शांता ने कहा कि किशोरावस्था में ही मेरा मन था कि मैं जीवन भर आरएसएस का प्रचारक बना रहूं। बैजनाथ के कृष्णानगर में शिक्षक की नौकरी लगे 17 दिन हुए थे। कश्मीर आंदोलन शुरू हो गया। संघ की ओर से मुझे कांगड़ा का जत्था लेकर कश्मीर जाने के आदेश हुए। घर में बहन बीमार थी। डॉक्टर ने उसे टमाटर ज्यादा खिलाने को कहा था। बहन ने मुझसे टमाटर मंगवाए थे। मैं स्कूल के बजाय सीधा कश्मीर चला गया। परिजनों को लगा कि मैं स्कूल गया हूं। 8 महीने की जेल काटने के बाद मैं घर पहुंचा।