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महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ा सकती हैं तो सेना का नेतृत्व क्यों नहीं?

Tue, 18 Feb 2020 06:11 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारतीय सेना की महिला अधिकारी - फोटो : PTI
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि महिलाओं को सेना में 'कमांड पोस्ट' नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी शारीरिक क्षमता की सीमाओं और घरेलू दायित्वों की वजह से वो सैन्य सेवाओं की चुनौतियों और ख़तरों का सामना नहीं कर पाएंगी। कमांड पोस्ट से मतलब है कि किसी सैन्य टुकड़ी की कमान संभालना यानी उस टुकड़ी का नेतृत्व करना।
सरकार ने कोर्ट में कहा, "महिलाएं गर्भावस्था की वजह से लंबे वक्त तक काम से दूर रहती हैं। वो एक मां होती हैं, परिवार और बच्चों के प्रति उनकी कई ज़िम्मेदारियां होती हैं, खासकर जब पति और पत्नी दोनों ही कामगर हों। इसलिए औरतों के लिए ये एक बड़ी चुनौती होगी।"
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- फोटो : सांकेतिक तस्वीर
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें राहत देते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि सेना में महिला को परमानेंट कमीशन दिया जाए। इसकी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ये सलाह भी दी कि महिलाओं को सीधी लड़ाई में नहीं उतारा जाना चाहिए, क्योंकि अगर उन्हें युद्ध बंदी बना लिया गया तो 'ये उस व्यक्ति, संस्था और पूरी सरकार के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर बहुत तनावपूर्ण होगा।'
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Women in Indian Army
कॉम्बैट आर्मी
इस बारे में रिटायर्ड मेजर जनरल राजेंद्र सिंह मेहता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि भारतीय सेना में महिलाएं बिल्कुल नहीं है। लेकिन अभी तक उन्हें कॉम्बैट भूमिका यानी युद्ध के मैदान में नहीं उतारा गया है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग भी इससे सहमति जताते हैं। वो कहते हैं कि भारतीय सेना में कॉम्बैट सपोर्ट सर्विसेज में कुछ हद तक महिलाएं कमांड करती हैं लेकिन उन्हें स्वतंत्र रूप से कमांड नहीं दी गई है। मेजर जनरल राजेंद्र सिंह मेहता के मुताबिक कॉम्बैट का मतलब है दुश्मन के साथ आमने-सामने की गुत्थम-गुत्थी वाली की लड़ाई करना। वो बताते हैं, "दुश्मन चाकू लगाकर वार करता है तो आपको भी राइफल में चाकू लगाकर वार करना होता है। ऐसी स्थिति में 20 से 40 मीटर की दूरी से फायर करना होता है। यहां तक कि मरने के लिए और घायल होने के लिए तैयार रहना होता है।"

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Indian Army Women Bharti - फोटो : सांकेतिक तस्वीर
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग कॉम्बैट आर्मी के बारे में समझाते हुए कहते हैं, "फौज में एक कॉम्बैट आर्म होती है - जो लड़ाई में जाती हैं। ये पैदल सेना और टैंक वगैरह पर सवार होते हैं। दूसरी है: कॉम्बैट सपोर्ट आर्म, जिनमें आर्टिलरी, इंजीनियर, सिग्नल आर्म शामिल होती हैं। तीसरी होती है: कॉम्बैट सपोर्ट सर्विसेज, जिसमें सप्लाई कोर, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल रिपेयर करने वाले लोग शामिल होते हैं। इन तीनों की अलग-अलग भूमिका है। कॉम्बेट आर्म में अब तक महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है। कॉम्बेट सपोर्ट आर्म में उन्हें कुछ हद तक जगह जरूर दी गई है और कुछ सर्विसेज में उनके लिए परमानेंट कमीशन भी लागू किया गया है।"।
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Indian Army Women Bharti - फोटो : सांकेतिक तस्वीर
विपरीत परिस्थितियों में असाधारण साहस
एचएस पनाग के अनुसार, "कॉम्बैट यानी युद्ध में महिलाओं के जाने की बात एक अलग मसला है। फिलहाल कॉम्बैट सैनिक के लिए स्टैंडर्ड बहुत ऊंचे हैं और उस लिहाज से औरतों के स्टैंडर्ड बहुत कम हैं। जैसे, भर्ती के दौरान महिलाओं को एक किलोमीटर की दौड़ का टेस्ट पास करना होता है, वहीं पुरुषों को पांच किलोमीटर की। या तो उनके स्टैंडर्ड बराबर किए जाएं। मेरे हिसाब से देश की गिनी-चुनी महिलाएं ही कॉम्बैट के फ़िटनेस टेस्ट को पास कर पाएंगी।" रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल पनाग के मुताबिक एक दूसरी समस्या यह है कि जब कोई पुरुष सर्विस करता है तो उसकी पत्नी उसके बच्चों की देखभाल करती है, ऐसा महिला के मामले में नहीं होगा। वो बच्चों से दूर रहेगी तो उसके बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। वो कहते हैं, ''ये जेंडर इक्वलिटी की बात नहीं है। हां टास्क इक्वलिटी भी होनी चाहिए।''
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indian army women
वहीं, सुप्रीम कोर्ट में महिला अफसरों का प्रतिनिधित्व कर रही मीनाक्षी लेखी और ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि कई महिलाओं ने विपरीत परिस्थितियों में असाधारण साहस का प्रदर्शन किया है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वो फ्लाइट कंट्रोलर मिंटी अग्रवाल ही थीं, जिन्होंने विंग कमांडर अभिनंदन को उस वक्त गाइड किया था, जब उन्होंने 'पाकिस्तान के एफ-16 को मार गिराया था।' इसके लिए मिंटी को युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित भी किया गया था।  वहीं इससे पहले मिताली मधुमिता ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर चरमपंथियों के हमले के दौरान बहादुरी दिखाई थी। इसके लिए उन्हें सेना मेडल दिया गया था।
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भारतीय सेना (महिलाएं) - फोटो : Flickr
युद्ध इंटरनेट और तकनीक के जरिए
हालांकि, एचएस पनाग इस पर अलग राय रखते हैं। वो कहते है, "एयरफोर्स पायलट का हवाई जहाज उड़ाना एक टेक्निकल बात है। वो भार उठाकर चलने वाली बात नहीं है। वो जमीन पर लेटकर रेंगने वाली बात नहीं है। उसमें लड़ाई वाले दिन 10 से 12 घंटे लगे रहने की बात नहीं है। इसी तरह कोई कहेगा कि मिसाइल बैट्री में भी महिलाएं हैं, तो जरूर वो वहां भी हो सकती हैं। इसलिए जिस काम में कम फिजिकल फिटनेस स्टैंडर्ड्स के साथ काम चल सकता है, वहां ये हो सकता है।"

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- फोटो : PTI
वहीं, राजेंद्र सिंह मेहता कहते हैं कि ये सच है कि फ़िटनेस स्टैंडर्ड हाई हैं पर ये भी देखना होगा कि क्या जो लड़ाई 100 साल पहले होती थी, हम आज भी वही लड़ाई लड़ने वाले हैं? मेहता कहते हैं, "आज का युद्ध इंटरनेट और तकनीक के ज़रिए होगा। उनका हमला फिजिकल ट्रूप्स के साथ होने से रहा। वो आपके सिस्टम को कोलैप्स कर देंगे। आपके कमांड एंड कंट्रोल चैनल्स को बर्बाद कर देंगे। वो पावर प्लांट्स में बग डालकर प्लांट्स को थमा देंगे। ट्रेनों को रोक देंगे, एयरपोर्ट्स को रोक देंगे।'' वो बताते हैं कि सिर्फ करीब 10 प्रतिशत फौज दुश्मन से आमने-सामने की लड़ाई लड़ती है। मेहता कहते हैं, "उसमें अगर आपको दिक्कत है तो औरतों को शुरू में मत भेजिए। पहले उनको दूसरे रोल दिए जाएं फिर यहां भी उतारा जाए।"


 

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- फोटो : ANI
दुनिया भर के उदाहरण
एचएस पनाग कहते हैं कि महिलाओं को हर महकमे में जाने की इजाजत मिलनी चाहिए। लेकिन इसके लिए वो स्टैंडर्ड्स को पूरा करें। जैसे अगर आपको माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना है तो फिर चाहे आप आदमी हैं या औरत, आपको अपना ऑक्सीजन सिलेंडर और सामान उठाकर चढ़ना ही पड़ेगा।
वहीं, मेहता कहते हैं कि ये कहना गलत है कि महिलाओं का वजन कम होता है वो वजन कम उठा सकती हैं, उन्हें फ्रैक्चर जल्दी हो जाते हैं और औरतों की हड्डियां कमजोर हैं। वो कहते हैं, ''ये कहानियां मैं 20 साल से सुनता आ रहा हूं और इसे गलत बताता आ रहा हूं।''


 

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- फोटो : Social Media
मेहता बताते हैं कि ब्रितानी सेना में टैंकों की यूनिट में महिलाएं कमांडिग ऑफिसर के साथ बैठती हैं और वो डिसिप्लिन ट्रेनिंग के लिए जिम्मेदार होती हैं। इसराइल, पाकिस्तान और भारत समेत 30-40 मुल्कों में महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं। इसराइल में 150 से ज्यादा महिलाएं युद्ध में मारी गई हैं। मेहता बताते है, "डेनमार्क और नॉर्वे में महिला अफसर सबमरीन की कैप्टन हैं। पहले सोचा जाता था कि सबमरीन में उनका मासिक चक्र अनियमित हो जाता है। उन्हें जगह ज़्यादा चाहिए, बाथरूम अलग चाहिए। लेकिन इन सब बातों को गड्ढे में डालकर नॉर्वे और डेनमार्क में उन्होंने महिलाओं को जहाज में जाने की इजाजत दे दी, पुरुष ट्रूप्स को कमांड करने दिया और देखा कि इसका कोई विरोध नहीं हुआ कि औरत उनको कमांड कर रही है। उन्हें सिर्फ कमांड करने वाले काबिल ऑफिसर चाहिए जो जिम्मेदारी संभाल सके।"
 

 

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- फोटो : US Army Twitter
युद्धबंदी होने पर।।।
मेहता कहते हैं, "औरतें बच्चों को पालती हैं, बच्चों को मज़बूत बनाने की ट्रेनिंग देती हैं। अगर हम उन्हें ही हम कमजोर समझें तो बच्चों पर असर कैसे पड़ने वाला है।" मेहता उन तर्कों को भी खारिज करते हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि महिलाओं को अगर युद्धबंदी बना लिया गया तो ये बहुत मुश्किल स्थिति होगी। इसके पीछे आमतौर पर बलात्कार होने के खतरे की बात की जाती है लेकिन शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न तो पुरुषों के साथ भी हो सकता है।

 
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- फोटो : US Army Twitter
युद्धबंदी होने पर पुरुषों के साथ भी बलात्कार होते हैं।
मेहता अमरीका की एक महिला अधिकारी का उदहारण देते हैं, "अमरीका में एक ब्रिगेडियर जनरल सर्जन थीं-रोंडा। रोंडा को युद्ध के दौरान बंदी बना लिया गया और उनके साथ बलात्कार किया गया। जब वो बाहर निकलकर आईं, तो ये बोलकर मर्दों को शर्मिंदा कर दिया कि उन्होंने अपनी जिंदगी में सबसे छोटी समस्या जो झेली वो रेप थी। सबसे ज्यादा मुझे उस वक्त महसूस हुआ जब मर्द ये मानने को तैयार नहीं थे कि महिलाएं युद्ध में किसी भी भूमिका में अच्छी हो सकती हैं।"

 
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