खेलों की दुनिया में अपना मुकाम बनाने वाली जिम्नास्ट स्वाति की कहानी ऐसी ही होनहार बेटियों में से एक है। जिन्होंने काशी की व्यायामशाला से वेटलिफ्टिंग तक का सफर तय किया। स्वाति काशी की व्यायामशाला में जिम्नास्टिक की प्रैक्टिस करती थी, पर नेशनल खेलने को कभी नहीं मिला। इस बीच महसूस किया कि वेट लिफ्टिंग पसंद है। खुद की पसंद को तवज्जो दी और स्वाति सिंह ने शुरू कर दी वेट लिफ्टिंग। इसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2006 से 2008 तक ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी चैंपियन रहीं। जूनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप साउथ अफ्रीका 2004 में सिल्वर मेडल जीता।
कॉमन वेल्थ गेम्स 2010 में हिस्सा लिया। कोशिशें जारी रहीं और 2014 के कॉमन वेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता। उसी वर्ष कजाकिस्तान में ओलंपिक क्वालिफाई इवेंट में हिस्सा लिया। इसके बाद पारिवारिक कारणों से ब्रेक ले लिया। फिर लाइफ में ऐसा मोड़ आया कि तय कर लिया कि वापस वेट लिफ्टिंग में खुद को साबित करना है।
वापसी की और खुद को साबित भी किया
बीते दिनों पारिवारिक जीवन में कुछ परेशानी के बाद एक बार फिर स्वाति खेल की ओर लौटीं। लौटते ही इंडिया कैंप में जगह बनाई और थाईलैंड में ईजीयूटी कप 2019 में हिस्सा लेकर साबित कर दिया कि वाकई वह एक पावर वुमन हैं। वर्तमान में रेलवे में हेड टिकट एग्जामिनर स्वाति बताती हैं, बीते दिनों जो कुछ भी हुआ, उसके बाद मैंने केडी सिंह स्टेडियम जाना शुरू किया। लोगों का ध्यान मेरे खेल से ज्यादा मेरे व्यक्तिगत जीवन पर रहता, कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ा। ऐसे में गेम पर फोकस करने के लिए मैं लखनऊ से निकल आई।