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International Women's Day 2023: जरूरतमंदों और असहायों को दिया सहारा, ये हैं भारत की पांच महिला समाज सेविकाएं

Wed, 08 Mar 2023 12:12 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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महिला समाज सेविकाएं - फोटो : pixabay
International Women's Day 2023: 27 फरवरी को एनजीओ दिवस मनाया जाता है। एनजीओ का अर्थ है गैर सरकारी संगठन। एनजीओ समाज के असहाय वर्ग और जरूरतमंदों की मदद के लिए कार्य करने वाला संगठन है। यह एक ऐसी संस्था है जो सरकार या किसी व्यवसायी के लिए कार्य नहीं करती और न ही इसका उद्देश्य किसी तरह का लाभ कमाना है, बल्कि जनसेवा के उद्देश्य से कार्य करती है। जरूरतमंदों की मदद, गरीब बेसहाराओं के दुख-दर्द में उनका साथ देना एनजीओ का कार्य है। एनजीओ में कार्य करने वाले लोग समाज के जुड़े किसी भी वर्ग के लोग हो सकते हैं। वहीं जब संगठन से अलग व्यक्तिगत स्तर पर कोई शख्स समाज सेवा का कार्य करता है तो उसे समाजसेवी कहते हैं। 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं। भारत में ऐसी कई महिलाएं हैं, जो मानवसेवा को लेकर अपने प्रयासों के कारण अपने आप में ही एनजीओ बन गईं। इन भारतीय महिलाओं ने समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष योगदान देते हुए गरीबों, बेसहारा लोगों की मदद की।  अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर भारत की पांच समाजसेवी महिलाओं के बारे में जानिए, जिनका मानव सेवा में योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
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मदर टेरेसा - फोटो : Facebook/The New Vision
मदर टेरेसा

जब भी समाज और मानव सेवा का जिक्र होगा, सबसे पहले मदर टेरेसा का नाम लिया जाएगा। मदर टेरेसा ने कम उम्र में ही मानव सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया था और इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए कई देशों की यात्रा की। अल्बानिया से आयरलैंड और फिर 1929 में भारत आईं। यहां उन्होंने भारतीयों की मदद में जीवन गुजारा। बाद में साल 1948 में मदर टेरेसा को भारत की नागरिकता मिल गई। मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार और भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है।
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सिंधुताई सपकाल - फोटो : instagram/vinaysindhutai
सिंधुताई सपकाल

महाराष्ट्र की सिंधुताई सपकाल हजारों अनाथ बच्चों की मां बनीं। उन्होंने रेलवे स्टेशन, फुटपाथ पर बैठने वाले गरीब और अनाथ बच्चों को आसरा दिया। उनका पेट भरने के लिए खुद सड़कों पर भीख मांगी। 1400 बच्चों की मां बनकर सिंधुताई सपकाल महाराष्ट्र की मदर टेरेसा बन गईं। सिंधुताई सपकाल को 700 से अधिक सम्मान मिल चुके हैं।

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बसंती देवी - फोटो : twitter/PIBDehradun
बसंती देवी

उत्तराखंड की बसंती देवी ने पर्यावरण संरक्षण, देश की संस्कृति और लोगों के जीवन में सुधार के लिए अतुलनीय प्रयास किए। कोसी नदी को बचाने, समाज में फैली कुरीतियों जैसी घरेलू हिंसा, महिलाओं पर होने वाले उत्पीड़न को दूर करने के लिए बसंती देवी ने महिला समूहों का आह्वान किया। महिला समूहों के माध्यम से उत्तराखंड के जंगलों को बचाने की मुहिम चलाई। बीते वर्ष बसंती देवी को पद्म पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया था।
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अरुणा राय - फोटो : facebook
अरुणा राय

राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय जब भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत थीं, तो उन्होंने राजस्थान के गरीब लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काफी प्रयास किया। बाद में सूचना का अधिकार कानून लागू कराने के लिए 6 अप्रैल 1995 में अजमेर के ब्यावर में आंदोलन किया। रोजगार गारंटी और सूचना का अधिकार कानून बनाने में अरुणा राय की भूमिका अहम रही। इसके अलावा अरुणा राय मजदूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापिका भी थीं। अरुणा राय को मैग्सेसे पुरस्कार और मेवाड़ सेवा श्री समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
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सुनीता नारायण - फोटो : facebook/SunitaNarain
सुनीता नारायण

पर्यावरणविद सुनीता नारायण पर्यावरण संरक्षण को लेकर समाज की जागरूकता बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। हरित ईंधन, पर्यावरण प्रदूषण, महानगरों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि तमाम आयामों पर समाज की जागरूकता बढ़ाने में सुनीता नारायण की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनके योगदान के कारण ब्रिटेन की सिटी ऑफ ईडनबर्ग काउंसिल ने सुनीता नारायण को 'ईडनबर्ग मेडल 2020 से सम्मानित किया है।
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