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Women's Day 2022: ग्रामीण महिलाओं का भविष्य संवार रहीं ये संगिनी नायिकाएं, जानिए इनकी कहानी

Tue, 08 Mar 2022 12:12 AM IST
कविता सरदाना लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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महिला दिवस 2022 - फोटो : Istock
भारत में कई ऐसी महिलाएं हैं, जो आज समाज की नायिकाओं की भूमिका में आ गई हैं। ये महिलाएं समाज में महिलाओं से जुड़े पूर्वाग्रह को तोड़ने की दिशा में लगातार कार्यरत हैं। दरअसल, समाज में आज भी पुरुषों और महिलाओं की "लैंगिक भूमिका" के आधार पर उनके कार्यों का निर्धारण होता है। लेकिन सवाल है कि यह भूमिकाएं किसने तय की हैं? महिलाओं और पुरुषों के कार्यों में विभेद किसने किया और क्या यह आज के दौर में भी मान्य है? सदियों पुरानी सामाजिक संरचनाओं के आधार पर क्या आज भी महिलाओं की क्षमता को आंका जाना उचित हैं? महिला हो या पुरुष दोनों के काम करने के लिए एक ही मस्तिष्क और एक ही हृदय होता है। जैसे अगर हम 'W' और 'M' अक्षर को ध्यान से देखें तो दोनों एक दूसरे के विपरीत रूप हैं। महिला और पुरुषों में भी यही अंतर है। लेकिन इसी तथाकथित लैंगिक भूमिकाओं को कुछ महिलाओं ने खारिज कर दिया और समाज में बड़ा बदलाव लाने का बीड़ा उठा लिया। विश्व महिला दिवस के मौके पर ऐसी ही नायिकाओं के बारे में जानेंगे, जो लैंगिक भूमिका को लेकर चले आ रहे पूर्वाग्रह को तोड़ने की दिशा में कार्य कर रही हैं।
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महिला दिवस 2022 - फोटो : अमर उजाला
 एसएस मौसमी- अंधविश्वास और मिथकों का भंडाफोड़

अंधविश्वास और मिथकों का भंडाफोड़ करने वाली 30 साल की एसएस मौसमी पश्चिम बंगाल में एक चेंजमेकर के तौर पर उभरीं। बंगाल के हल्दिया स्थित चावलापुर गांव से जन्मी मौसमी एक रूढ़िवादी संयुक्त परिवार से ताल्लुक रखती है। चार साल के बच्चे की मां होने के नाते, मौसमी की अपने समुदाय के लिए कुछ करने की ललक थी। वह घर पर खुद को व्यस्त रखती थीं और सही खान-पान, व्यक्तिगत स्वच्छता और बच्चों की देखभाल के तरीकों को अपनाने के बारे में बहुत जिज्ञासा रखती थीं। परिवार के सदस्यों का अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखना आदि पर उनका फोकस रहता लेकिन समाज को लेकर भी उनकी चिंता वैसी ही थी। वह कई गर्भवती महिलाओं को अंधविश्वास का शिकार होते देख  चुकी थीं। सदियों पुरानी मान्यताओं के कारण, गर्भवती महिलाओं को डेयरी, कुछ फल, सब्जियां, तेल का सेवन करने से मना किया जाता था। वहीं महिलाओं को संस्थागत प्रसव और टीकाकरण का विकल्प चुनने के लिए राजी करना भी मुश्किल होता है। लेकिन सुपोषण संगिनी बनकर मौसमी ने महिलाओं के ज्ञान की खाई को पाटने के लिए कार्य करना शुरु किया। प्रसवपूर्व देखभाल पंजीकरण, कुपोषित बच्चों के केसलाइड (13 एसएएम और 21 एमएएम), आईएफए टैबलेट की खपत के प्रति अनिच्छा आदि मामलों में संघर्ष करने लगीं। मौसमी रोजाना 10-12 घरों में जाती है और पुरुषों को भी फैमिली काउंसलिंग में शामिल करती। इससे महिलाओं की क्षमताओं और व्यवहार में बदलाव की प्रवृत्ति का निर्माण होता। उनकी मेहनत का परिणाम है कि वीएचएसएनडी के डाटा स्रोत के अनुसार, अब गांव में 125 बच्चों में से गर्भावस्था पंजीकरण 100%, 0% गंभीर तीव्र कुपोषित बच्चे और केवल 4% मध्यम तीव्र कुपोषित बच्चे हैं।
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महिला दिवस 2022 - फोटो : अमर उजाला
आश्रित से भरोसेमंद: एसएस चंद्रप्रभा अहिरवार

मध्य प्रदेश के विदिशा जैसे छोटे से शहर में जहां महिलाओं को काम करने की अनुमति नहीं है, अदानी फाउंडेशन ने दस महिलाओं को सुपोषण संगिनी बनने के लिए प्रशिक्षित किया। चंद्रप्रभा अहिरवार उनमें से एक हैं। प्रोजेक्ट में शामिल होने से पहले वह अपने क्षेत्र की 'बहू' के रूप में बेहतर जानी जाती थीं। वह हमेशा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से परेशान रहीं, जिसमें चिकित्सा खर्चों के लिए उन्हें ससुराल की पेंशन पर निर्भर रखना पड़ता। उनकी परेशानी तब और बढ़ गई, जब साल भर चंद्रप्रभा अहिरवार के पति बेरोजगार रहे। दो संगिनियों से मिलने के बाद उन्होंने बाहर निकलने और खुद के लिए कमाने की प्रेरणा मिली। संगिनी के रूप में प्रशिक्षित होने पर उन्होंने सबसे पहले अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभाली। उसके बाद चंद्रप्रभा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पिछले दो वर्षों में उन्होंने 896 परिवारों का आधारभूत सर्वेक्षण, 265 बच्चों की सार्वभौमिक मानवमिति और 890 किशोरियों की एचबी स्क्रीनिंग कराई है। वह आत्मविश्वास से आईसीडीएस कार्यकर्ताओं का समर्थन करती हैं और अच्छे पोषण स्तर के महत्व पर जागरूकता फैलाती हैं। वह ग्राम स्तर के कार्यक्रमों में लाभार्थियों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करती है और आईसीडीएस कर्मचारियों द्वारा उसके प्रयासों की सराहना की जाती है। 

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महिला दिवस 2022 - फोटो : istock
एसएस ममीना प्रधान, शिक्षा के लिए कोई उम्र नहीं

ओडिशा के रवींद्र नगर गांव में रहने वाली ममीना के लिए वह दुख की घड़ी थी जब उनका पति एक बच्चे को छोड़कर बड़े बेटे को जबरन दूसरे गांव ले गया। 2 साल से वह दुखदायी जीवन जीती रहीं लेकिन संगिनी ने उनका जीवन बदल दिया। ममीना के भाई ने उसे सुपोषण परियोजना में शामिल होने के लिए राजी किया। मैट्रिक पास ममीना को शुरु में हिचकिचाहट हुई। ममीना को गाँव के समुदाय की स्वीकृति मिलने पर भी संदेह था। मासिक सुपोषण प्रशिक्षण और उसके बाद की गतिविधियों के साथ, उन्होंने एक नई पहचान अर्जित की। ममीना ने दोबारा पढ़ाई शुरु की। 12 वीं कक्षा की परीक्षा पास की और फिर एक दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से स्नातक किया। 2021 में पैथोलॉजी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम करने के लिए प्रेरणा मिली। आज वह अपने बेटे की स्कूली शिक्षा की देखरेख करते हुए अपने ही गांव की पैथोलॉजी प्रयोगशाला में काम कर रही हैं। 
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महिला दिवस 2022 - फोटो : istock
बदलाव: एसएस संजू देवी

उत्तर प्रदेश की वाराणसी की रहने वाली संजू का सपना टीचर या ट्रेनर बनने का था, लेकिन उसकी शादी 17 साल की उम्र में 12वीं पास करने के तुरंत बाद कर दी गई थी। उसका जीवन अब पारिवारिक जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमता था और आगे पढ़ने का मौका नहीं मिला। दो बच्चों का जन्म और पति के शराब की लत व बेरोजगारी के कारण परिवार ने संजू को बाहर निकाल दिया। उसने अपने मायके में शरण ली लेकिन जल्द ही महसूस किया कि उसे काम खोजने की जरूरत है। लगभग उसी समय, उन्हें सुपोषण संगिनी बनने का अवसर मिला। उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण और चाइल्डकैअर पर प्रशिक्षण में सक्रिय रूप से भाग लिया। उनके दृढ़ संकल्प और प्रगति को देखकर उनके पति को रोजगार खोजने की प्रेरणा मिली। अपने परिवार के निर्णय निर्माता होने के नाते, वह शिक्षा, स्वस्थ भोजन और बेहतर जीवन स्तर को एकीकृत कर रही है। 
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महिला दिवस 2022 - फोटो : pixabay
गोइंग एबव एंड बियॉन्ड: एसएस संपा घोरई दास

बंगाल की संपा ने अपने आसपास की सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करते हुए किशोरियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में बातचीत को गति देने की पहल की। कुछ केंद्रित समूह चर्चाओं के बाद, उसने महसूस किया कि परामर्श पर्याप्त नहीं होगा। मासिक धर्म स्वच्छता के खराब व्यवहार के कारण कई सामाजिक निर्धारक थे, उनमें से एक स्थानीय दुकान में सैनिटरी नैपकिन की अनुपलब्धता थी। संपा ने व्यक्तिगत पहल के रूप में अपने घर पर सैनिटरी नैपकिन के स्टॉक की व्यवस्था करने का फैसला किया। अब लड़कियां बिना किसी हिचकिचाहट के उनसे सैनिटरी नैपकिन खरीदने के लिए संपर्क कर सकती थीं। संगिनी ने अपने निर्धारित कर्तव्यों से परे और बिना किसी मौद्रिक लाभ के, एक सूत्रधार के रूप में काम किया। अभी तक गांव में 230 किशोरियां सैनिटरी नैपकिन का उपयोग कर रही हैं। 
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महिला दिवस 2022 - फोटो : Istock
दरवाजे पर आहार पर्याप्तता: एसएस हेमलता बैरागी

राजस्थान के बूंदी से आने वाली एसएस हेमलता बैरागी के सुपोषण संगिनी बनने पर जीवन ने पूरी तरह से मोड़ ले लिया। कई सालों तक घर के अंदर रहने के बाद घरेलू दबाव के चलते घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था। लेकिन परिवार में आठ लोगों का पेट भरना था और किसी को बाहर जाना पड़ा। उनका गांव चार फालियासा में बंटा हुआ था और उसे सबसे दूर का फालिया सौंपा गया था। घरेलू सर्वेक्षण, बच्चों की स्क्रीनिंग, परिवार परामर्श और अन्य परियोजना गतिविधियों की अपनी दिनचर्या में शामिल कर हेमलता ने डाटा अपडेट करने का भी काम किया। चूंकि यह परियोजना पोषण वाटिका के विकास को बढ़ावा देती है, इसलिए उन्होंने सबसे पहले अपने घर पर एक वाटिका विकसित की। सभी मौसमी सब्जियां, जड़ी-बूटियां और फल उगाए। अन्य महिलाओं को खुले आंगन में सब्जियां उगाने के लिए प्रोत्साहित किया। 
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महिला दिवस 2022 - फोटो : pixabay
सशक्तिकरण के रूप में अधिकार प्राप्त: एसएस सुचित्रा मांझी

तीन साल से सुपोषण संगिनी सुचित्रा के परिवार को जलवायु गड़बड़ी के कारण अपनी खेती में काफी नुकसान उठाना पड़ा। छह लोगों को खिलाना बहुत चुनौतीपूर्ण था और इसलिए उन्होंने अदानी फाउंडेशन की अन्य सीएसआर गतिविधियों के प्रति रुचि व्यक्त की। फाउंडेशन की सतत आजीविका विकास पहल और ओडिशा आजीविका मिशन के तत्वावधान में उन्होंने 80 ग्रामीण महिलाओं को मशरूम की खेती और नाश्ता बनाने के लिए एक उत्पादक समूह बनाने के लिए प्रेरित किया। इस समूह को प्रशिक्षित किया गया और आत्मनिर्भरता की शुरुआत को चिह्नित किया। अब ये महिलाएं प्रति माह INR 3,000 से 4,000 तक कमा सकती हैं। सुचित्रा सक्रिय रूप से ग्राम विकास कार्यों की दिशा में काम करती है और कई अन्य महिलाओं के लिए अपनी क्षमताओं में विश्वास के साथ अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए एक उदाहरण बन गई हैं। गांव पीआरआई सदस्यों और गांव की कई महिलाओं के अनुसार, जब कोई समस्या या संकट होता है तो सुचित्रा अपने गांव में पहली संपर्क व्यक्ति होती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उन्हें गांव की "सुपर संगिनी" के रूप में जाना जाता है।
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