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कोरोना वार्ड में ड्यूटी करती एक नर्स की कहानी जो एक 'मां' भी है

Wed, 03 Jun 2020 09:24 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
कोविड-19 मरीजों का इलाज और देखभाल कर रहे डॉक्टरों और नर्सों को किस तरह की इमोशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? उनके परिवार कैसी परिस्थितियों में रह रहे हैं? खासतौर पर इन डॉक्टरों और नर्सों के बच्चों पर क्या गुजर रही है? इसे जानने के लिए एक नर्स का अनुभव जानिए। इन्हें एक कोरोना वार्ड और अपने बेटे की देखभाल करनी पड़ रही है।

 
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मैं एक कोविड वार्ड की नर्स हूं
उस दिन हमें हमारे हॉस्पिटल में एक आकस्मिक मीटिंग के लिए बुलाया गया था। मीटिंग में हमें बताया गया कि हमारा हॉस्पिटल कोविड के मरीजों को भर्ती करेगा और हमें खुद को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार करना होगा।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
वार्ड की तैयारी
हमने जरूरत के हिसाब से वार्ड्स को तैयार करना शुरू कर दिया। कुछ मरीज हमारे यहां कस्तूरबा हॉस्पिटल से आने थे और हम इन जरूरतों के लिए खुद को तैयार करने में जुट गए। बाद में मुझे पता चला कि मेरे डिपार्टमेंट को कोविड वार्ड के तौर पर चुना गया है। 20 तारीख से हमने कस्तूरबा हॉस्पिटल के मरीजों को अपने यहां भर्ती करना शुरू कर दिया। इससे पहले मैं इसी तरह के मामलों के लिए दूसरे विभागों में मदद कर चुकी थी, ऐसे में मुझे ज्यादा डर नहीं लग रहा था। हम पढ़ते रहे थे कि क्या चीज जरूरी है और किस तरह के इंतजाम किए जाने हैं। हमें यही सब काम अपने वार्ड में करने थे, लेकिन हमने यह महसूस किया कि हमें खुद को अपने परिवारों से दूर रखना है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
अधूरी रह गई बेटे का जन्मदिन मनाने की हसरत
मेरे बेटे ने अभी ही 10वीं की परीक्षा दी थी और 24 मार्च को उसका जन्मदिन था। मैं कई दिन पहले ही अपने बेटे के जन्मदिन के लिए छुट्टी का आवेदन कर चुकी थी और इसे मनाने के लिए काफी सारी तैयारियां पहले ही की जा चुकी थीं। चूंकि मेरे पति एक जर्नलिस्ट हैं, ऐसे में हम दोनों ही नियमित रूप से काम पर जा रहे थे। लेकिन, मेरे बेटे के जन्मदिन के कुछ दिन पहले से कोविड मरीज हमारे वार्ड में आने लगे। ऐसे में मैंने अपने पति के साथ इस बारे में बात की और अपने बेटे को उसकी नानी के यहां भेज दिया। जब 24 मार्च आई तो मैंने अपनी छुट्टी कैंसिल करा दी और काम पर चली गई। मैं उस दिन रात 8 बजे तक हॉस्पिटल में रही। इस व्यस्तता में मैं यह पूरी तरह से भूल गई कि आज मेरे बेटे का जन्मदिन है। बाकी सेलिब्रेशन तो छोड़ दीजिए, मैं उसे विश तक नहीं कर पाई।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
वह मेरी मां के यहां था। उसकी मौसी और नानी ने जन्मदिन के रीति-रिवाज पूरे किए। लेकिन, हम खुद को रोक नहीं पाए और रात के 11 बजे उससे मिलने पहुंच गए। आधी रात को हम भगवान के सामने खड़े हुए और उन्हें धन्यवाद दिया। भले ही यह उसका जन्मदिन था, लेकिन उसकी मां उसके लिए कुछ भी खास नहीं कर पाई थी। हालांकि, मेरे बेटे ने न तो कोई शिकायत की न ही वह बिलकुल भी गुस्सा हुआ। इसकी बजाय उसने मुझे दिलासा दिया। उसने कहा, 'इट्स ओके ममा, जब यह सब ख़त्म हो जाएगा तब हम जन्मदिन सेलिब्रेट कर लेंगे। मुझे उससे वादा करना चाहिए था, लेकिन, इसकी बजाय वह मुझसे वादा कर रहा था।

 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay
मरीज स्टेबल होने से बढ़ा मनोबल
तब मेरा मरीज़ों के सीधे संपर्क में आना शुरू हो गया था। मेरे विचार दिमाग में घूम रहे थे। मैं जानती थी कि मैं और मेरी टीम इससे संक्रमित हो सकती है। मेरे वार्ड में पहले मरीज के दाख़िल होने के पहले मैंने अपनी टीम को पास बुलाया। मैंने उन्हें गले लगाया और कहा, 'अब हमें इस पूरे हालात को संभालना है। एक टीम लीडर के तौर पर यह मेरी जिम्मेदारी है कि आप सबका ख्याल रखूं। हमें अपना ख्याल भी रखना है और अपने मरीजों का भी। यह सब कहते हुए मैं अपने आंसू रोक नहीं पाई, लेकिन मैंने कदम पीछे नहीं खींचने का ऐलान किया क्योंकि हम पर समाज का ऋण है।
जब पहला मरीज स्टेबल हो गया तो हमें थोड़ी सी हिम्मत मिली। हालांकि, हमने अपने बेटे को उसकी नानी के पास भेज दिया था, लेकिन मेरे पति घर पर ही मेरे पास थे। उनकी सेफ़्टी कैसे करनी है, यह भी बड़ा सवाल था। अगर मैं घर पर आती हूं तो क्या कोई दूसरा भी मुझसे संक्रमित हो सकता है? क्या मेरी सोसाइटी को मेरी वजह से कोई दिक्कत होगी? इस तरह के कई विचार मेरे दिमाग में कौंध रहे थे और मैं अपने दिल में रो रही थी। कुछ दफा मुझे शक हुआ कि क्या मैं इस जिम्मेदारी को उठा भी पाऊंगी या नहीं।

 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
बेटे ने बढ़ाया मनोबल
ऐसे मानसिक उथल-पुथल के हालात में, मैंने एक बार अपने बेटे को कॉल किया। मैंने उसे बताया कि वह हमारे यहां किसी भी कीमत पर न आए। साथ ही मैंने उसे बताया कि उसके पिता भी उससे मिलने नहीं आ पाएंगे। चूंकि ट्रैवल करने के सभी विकल्प बंद हो गए थे, ऐसे में मेरे पति हर सुबह मुझे हॉस्पिटल छोड़ने जाते थे और उसके बाद वह अपने दफ्तर जाते थे। यह सब समझते हुए मेरे बेटे ने इससे निबटने के लिए मानसिक मजबूती का परिचय दिया। उसने मेरा मनोबल बढ़ाते हुए कहा, 'ममा, कोई बात नहीं। आप यहां मत आइएगा। मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी।' लेकिन, मैं रो रही थी… मेरे बेटे ने कहा, 'ममा, आपको रोना नहीं चाहिए।'
पंद्रह मिनट में वह दरवाजे पर खड़ा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बिठाया। उसने कहा, 'मम्मी आपको रोना नहीं है। आप एक बड़ा काम कर रही हैं। पापा, नानी, नाना, चाचा हम सबको आप पर गर्व है। मेरे दोस्त भी इस बात पर गर्व करते हैं कि आप एक नर्स हैं। आपको रोना नहीं चाहिए। मैं भरोसा करता हूं कि आप यह काम कर सकती हैं।' मेरा 15 साल का बेटा मुझसे भी बड़ा हो गया था और वह मुझे दिलासा दे रहा था।

 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
हर दिन मेरा हालचाल पूछता था बेटा
उसके बाद वह हर दिन मुझे कॉल करता था। वह पूछता था, 'आप घर पर पहुंच गईं? आपने खाना खा लिया? हॉस्पिटल में क्या हुआ? क्या आप अपना ख्याल रख रही हैं?' हर दिन उससे बात करते वक्त मैं रोने लगती थी और वह मुझे दिलासा देता था। जब मैं वीडियो-कॉल करती थी, वह कहता था, 'देखो, मैं अच्छा हूं और मैं बिलकुल फिट हूं।' फिर मैं हंसने लगती थी। कई बार मुझे लगता था कि चूंकि मैं पीपीई पहनती हूं ऐसे में मैं खतरे से बाहर हूं। मैं बाहर जा सकती हूं और अपने बेटे से मिल सकती हूं। लेकिन, ऐसे मौकों पर, मेरे पति मुझे इस तथ्य से वाकिफ कराते थे कि यह मेरे उम्रदराज मां-बाप के लिए बेहद खतरा पैदा कर सकता है। 14 दिनों तक अस्पताल में मैं 10-12 घंटे तक काम करती रही। वार्ड कोविड मरीजों से भर गया था। लेकिन, फोन कॉल्स से मुझे संबल मिलता था। मुझे नहीं पता कि जब यह महामारी नियंत्रण में आएगी। मेरे बेटे को शायद तब तक अपनी नानी के यहां ही रहना पड़े। मैं शायद उस वक्त तक उससे मिल भी न पाऊं। 



 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
14 दिन की वार्ड ड्यूटी और फिर होटल में क्वारंटीन
14 दिन की ड्यूटी के बाद मुझे एक होटल में 14 दिनों के लिए क्वारंटीन कर दिया गया। मेरे पति घर पर अकेले थे। मैं होटल में थी और मेरा बेटा नानी के यहां था। हम तीनों अलग-अलग जगहों पर थे।सौभाग्य से फोन कॉल्स और वीडियो कॉल्स से बहुत मदद मिली। हम एक-दूसरे को देख सकते थे। मुझे नहीं पता कि कब वह दिन आएगा जब हम तीनों लोग एकसाथ बैठकर बातचीत कर पाएंगे। क्वारंटीन की अवधि के पूरे होने के बाद मुझे एक टेस्ट कराना पड़ा। यह टेस्ट नेगेटिव आया। मुझे घर जाने की इजाजत मिल गई। मैं आपको बता नहीं सकती कि टेस्ट के रिजल्ट के नेगेटिव आने से मैं कितनी खुश थी। मेरे अंदर थोड़ा साहस आ गया था कि 14 दिन तक कोविड मरीज़ों के साथ रहने के बावजूद मैं इस संक्रमण से बच गई हूं।

 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
सीधे मां के घर पहुंची
अपने पति को कुछ भी बताए बगैर मैं सीधी अपनी मां के घर पहुंच गई। मेरा बेटा मुझे अलग लग रहा था क्योंकि मैं उससे एक महीने बाद मिल रही थी। वह बड़ा लग रहा था। वह वैसा नहीं लग रहा था जैसा मैं रोजाना उसे अपने फोन में देखती थी। एक महीने के दौरान कई चीजें बदल गई थीं। हालांकि, मेरा रिजल्ट नेगेटिव था, लेकिन मैंने उसे गले नहीं लगाया क्योंकि मेरे दिमाग में डर बैठा हुआ था। मेरा बेटा वैसे तो खुलकर अपनी बात नहीं कहता था, लेकिन मेरे लिए उसने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट लिखी औऱ मैं उसे गले लगाना चाहती थी और खूब रोना चाहती थी। मैं कहना चाहती थी कि वह अब मुझसे भी ज्यादा परिपक्व हो गया है और मैं उसके जितनी परिपक्व नहीं हूं। मैं अपनी मां के यहां 15 मिनट तक रुकी। दो दिन के ब्रेक के बाद मैंने काम फिर से शुरू कर दिया। एक बार फिर से एक महीने का साइकल शुरू हो गया। लेकिन, मुझे भरोसा है कि सबकुछ सामान्य हो जाएगा और हम फिर से एकसाथ आ जाएंगे
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